FSSAI के एक फैसले से फूड कंपनियों पर करोड़ों का बोझ! पैकेट से '100%' हटाने की असली कीमत क्या है?
भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (FSSAI) ने फूड कंपनियों को पैकेट पर 100% या 100% शुद्ध जैसे शब्दों का ...और पढ़ें

फूड कंपनियों पर करोड़ों का बोझ।

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नई दिल्ली। भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (FSSAI) ने हाल ही में फूड कंपनियों को अपने पैकेट और विज्ञापनों पर "100%" या "100% शुद्ध" जैसे शब्दों का इस्तेमाल करने से रोक दिया है। उपभोक्ताओं के लिए यह सिर्फ भ्रामक विज्ञापनों को रोकने वाला एक छोटा कदम लग सकता है, लेकिन फूड कंपनियों के लिए एक पैकेट से सिर्फ एक शब्द को हटाने की कीमत सैकड़ों करोड़ रुपये तक पहुंच सकती है।
भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (FSSAI) ने हाल ही में खाद्य कंपनियों को अपनी पैकेजिंग और विज्ञापनों में "100%" या "100% शुद्ध" जैसे शब्दों का इस्तेमाल करने से रोक दिया है। ग्राहकों के नजरिए से गुमराह करने वाले विज्ञापनों को रोकने के लिए यह भले ही एक छोटा कदम लगे, लेकिन खाद्य कंपनियों के लिए पैकेज से सिर्फ एक शब्द हटाने की लागत सैकड़ों करोड़ रुपये तक हो सकती है।
सिर्फ पैकेट बदलना नहीं है आसान
TeamLease Regtech के CEO और को-फाउंडर ऋषि अग्रवाल के अनुसार, भले ही बाहर से यह सिर्फ़ लेबल बदलने जैसा लगे, लेकिन असल में इससे कंपनियों के लिए कई तरह की वित्तीय, ढांचागत और रेगुलेटरी चुनौतियां पैदा होती हैं। एक मध्यम आकार की फ़ूड कंपनी के पास 200 से 500 तक अलग-अलग तरह के प्रोडक्ट (SKU) हो सकते हैं। पैकेट के साइज़ और भाषा के आधार पर डिज़ाइन में बदलाव करने, मंज़ूरी लेने और नई प्रिंटिंग प्लेट बनाने में करोड़ों का खर्च आता है। इसके अलावा, वेयरहाउस और बाज़ार में मौजूद पुरानी पैकेजिंग के स्टॉक को जल्दबाज़ी में बेचना, वापस मंगाना या नष्ट करना पड़ता है।
तीन स्तरों पर पड़ता है असर
अग्रवाल बताते हैं कि नियमों के पालन से जुड़ी यह लागत मुख्य रूप से तीन स्तरों पर आती है। पहली है 'डायरेक्ट कॉस्ट' (सीधी लागत) जैसे डिज़ाइन बदलना और पुराने पैकेजिंग मटीरियल का नुकसान। दूसरी है 'अपॉर्चुनिटी कॉस्ट' (अवसर लागत)जिसमें मार्केटिंग और लीगल टीमें नए प्रोडक्ट लॉन्च करने के बजाय महीनों तक सिर्फ़ लेबल बदलने में ही उलझी रहती हैं। और तीसरी है 'सिस्टमिक कॉस्ट' (सिस्टम से जुड़ी लागत), जिसमें पुराने स्टॉक को निकालने के लिए दिए जाने वाले भारी डिस्काउंट और फंसी हुई वर्किंग कैपिटल शामिल हैं।
नियमों में स्पष्टता की मांग
एक अच्छी बात यह है कि FSSAI ने इन नियमों को लागू करने के लिए हर साल 1 जुलाई की तारीख तय की है और 180 दिनों का ट्रांज़िशन पीरियड (ग्रेस पीरियड) दिया है। इंडस्ट्री इसे एक सकारात्मक कदम मानती है।
एपिस इंडिया लिमिटेड के MD अमित आनंद का कहना है कि मार्केट में पारदर्शिता के लिए यह कदम ज़रूरी है। ग्राहकों को ऐसे दावे जानने का हक है जो वैज्ञानिक रूप से साबित हों। हालांकि, भारत में 25 लाख फूड प्रोसेसिंग यूनिट्स में से 98% छोटे और माइक्रो-एंटरप्राइज़ हैं। जानकारों का मानना है कि ऐसे बड़े बदलाव लागू करने से पहले सही 'आर्थिक आकलन' किया जाना चाहिए, ताकि यह पक्का हो सके कि ये नियम छोटे व्यवसायों के लिए संकट न बन जाएं।
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