नई दिल्ली, सुरेंद्र प्रसाद सिंह। चावल की देसी प्रजातियों की घरेलू व निर्यात मांग बढ़ने से इनकी खेती को प्रोत्साहन मिलने लगा है। संरक्षित चावल की कई प्रजातियों की उत्पादकता बढ़ाने के लिए इंडियन काउंसिल आफ एग्रीकल्चरल रिसर्च (आइसीएआर) के तहत कई संस्थानों में अनुसंधान हो रहा है। जेनेटिक सुधार के माध्यम से देसी चावल की गुणवत्ता व सुगंध बनाए रखने के साथ उत्पादकता में वृद्धि पर जोर दिया जा रहा है। इसी टेक्नोलाजी के माध्यम से पूर्वी उत्तर प्रदेश का काला नमक का पौधा बौना हो गया है और पैदावार बढ़ गई है। देसी प्रजातियों के संरक्षण में किसानों और स्थानीय समुदायों की भूमिका अहम है। कृषि मंत्रालय ऐसे समुदायों व किसानों को विशेष प्रोत्साहन दे रहा है।

आइसीएआर के दिल्ली स्थित नेशनल ब्यूरो आफ प्लांट जेनेटिक रिसोर्स (एनबीपीजीआर) में फिलहाल 45,107 देसी प्रजाति के चावलों को संरक्षित किया गया है, जिन्हें समय-समय पर रिसर्च के उद्देश्य से जारी किया जाता है। चावल की संरक्षित प्रजातियों में 4,000 से अधिक प्रजातियों का संरक्षण परंपरागत किसानों ने कर रखा है। इनमें पोषण व गुणवत्ता तथा स्वास्थ्य के लिहाज से बेहतर और सुंगधित प्रजातियों की उत्पादकता बढ़ाने में सफलता मिली है। कुल 26 सामुदायिक सीड बैंक स्थापित किए गए हैं। किसानों ने चावल की कुल 1645 ऐसी प्रजातियां संरक्षित की है, जिन्हें जीआइ टैग प्राप्त हो चुका है।

इंडियन एग्रीकल्चरल रिसर्च इंस्टीट्यूट (आइएआरआइ) के निदेशक व चावल के प्रमुख विज्ञानी डा. एके सिंह का कहना है कि देसी प्रजाति वाले चावलों की निर्यात मांग संभावनाएं बढ़ी हैं। पश्चिम एशिया के देशों में सुगंधित प्रजाति वाले भारतीय चावलों की मांग है। खाद्य उत्पादों की निर्यात एजेंसी एपीडा ने इस दिशा में प्रयास भी शुरू कर दिया है। सिंह ने बताया कि विभिन्न राज्यों में चावल की करीब 150 प्रजातियां चिन्हित की गई है, जिन्हें ज्योग्राफिकल इंडिकेशन (जीआइ) टैग भी मिल चुका है। ऐसी प्रजातियों को विकसित करने की दिशा में जगह-जगह शोध का कार्य चल रहा है, ताकि उनकी खेती को आसान बनाने के साथ उत्पादकता बढ़ाई जा सके।

उत्तर प्रदेश में काला नमक, आदम चीनी और जीरा बत्तीस जैसी प्रजातियां हैं, जिनमें काला नमक को बौनी प्रजाति में तब्दील कर दिया गया है। उसकी उत्पादकता में भी वृद्धि हुई है। जेनेटिक सुधार से पैदावार बढ़ाने की कोशिश कामयाब हो रही है। ओडिशा का काला जीरा, बंगाल का गोविंदभोग व रंधूनी पागल और बिहार के कतरनी को जीआइ टैग मिल चुका है। वहीं, महाराष्ट्र की अंबे मोहर, छत्तीसगढ़ की तिलक चंदन, केरल की जीरकशाला, गंधकशाला, आंध्र प्रदेश के चित्तमुती आत्म, जम्मू-कश्मीर के मुश्क-बुद्जी और मणिपुर की चखाव पैराडान प्रजाति की गुणवत्ता को देखते हुए उसे व्यावसायिक खेती के लिए तैयार किया जा रहा है।

अग्रणी देसी प्रजाति वाले इन चावलों को संरक्षित करने वाले किसानों और समुदायों को हर साल 10 लाख रुपए तक का पुरस्कार दिया जा रहा है। फिलहाल देश के 10 हजार से अधिक किसानों के खेतों पर इस तरह की प्रजाति वाले चावल (धान) की खेती की जा रही है। स्थानीय स्तर पर इन प्रजातियों को प्रोत्साहित करने में राज्यों के कृषि विश्वविद्यालय, जिला स्तर पर कृषि विज्ञान केंद्र, स्वय सहायता समूह और गैर सरकारी संगठनों (एनजीओ) की भूमिका अहम है। इन प्रजातियों के बीजों को संरक्षित करने के लिए सामुदायिक प्रशिक्षण भी दिया जा रहा है। इन प्रजातियों की खेती वाले किसानों को इसके बीज भी वितरित किए जाते हैं।

Edited By: Ankit Kumar