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कर्ज, 'कैश काऊ' और वो 2 फैसले.. मुकेश अंबानी से कैसे पिछड़े 'मैराथन मैन'; 21 साल में कहां से कहां आ गए अनिल अंबानी

Published: Wed, 09 Sep 2026 06:08 PM (IST)

अनिल अंबानी मुकेश अंबानी से पीछे क्यों रह गए, इसका मुख्य कारण रिलायंस समूह के बंटवारे में मुकेश को 'कैश काऊ' कंपनी मिलना और अनिल को पूंजी-गहन व्यवसाय मिलना था।

जून 2005 में हुआ था दोनों भाइयों के बीच संपत्ति का बंटवारा

जून 2005 में हुआ था दोनों भाइयों के बीच संपत्ति का बंटवारा

HighLights

  1. मुकेश को बंटवारे में रिलायंस की 'कैश काऊ' कंपनी मिली।

  2. अनिल अंबानी ने अलग-अलग सेक्टर में पैठ बनाने के लिए कर्ज लिया।

  3. टेलीकॉम में CDMA पर अड़े रहना बड़ी गलती साबित हुई।

नई दिल्ली। अक्सर यह सवाल उठता है कि आखिर क्या वजह रही कि दौलत कमाने की दौड़ में अनिल अंबानी, मुकेश अंबानी से पीछे रह गए। इसका सबसे बड़ा कारण है रिलायंस समूह की 'कामधेनु कंपनी', जो पिता धीरू भाई अंबानी के निधन के बाद बंटवारे के वक्त मुकेश अंबानी के हाथ लगी और अनिल अंबानी को अन्य कंपनियों की कमान मिली। ये 'कैश काऊ' कौन थी हम आपको बताएंगे, साथ ही अनिल अंबानी की उन 2 गलतियों के बारे में भी बताएंगे जो उन पर भारी पड़ी।

एक वक्त था जब भारत के कॉरपोरेट वर्ल्ड में अनिल अंबानी का जलवा था और वे मुकेश अंबानी से ज्यादा लोकप्रिय थे। उनकी चर्चा बिजनेस वर्ल्ड के साथ-साथ बॉलीवुड के गलियारों में भी होती थी, उन्हें मैराथन मैन भी कहा जाता है। 6 जुलाई 2002 में धीरू भाई अंबानी के निधन के बाद रिलायंस समूह का बंटवारा हुआ और इसके बाद शुरू हुई अनिल अंबानी की अग्निपरीक्षा, क्योंकि अब उन्हें अपने दम पर आगे बढ़ना था। लेकिन, यहां वे बुरी तरह विफल हो गए।

21 साल में कहां से कहां आ गए?

अनिल अंबानी का दिवालिया होना भारत के कॉर्पोरेट इतिहास और शेयर बाज़ार की सबसे बड़ी केस स्टडीज़ में से एक है। 2002 में रिलायंस के फाउंडर धीरूभाई अंबानी का निधन हो गया और वे बिना वसीयत छोड़े इस दुनिया से चले गए। इसके बाद, उनकी पत्नी कोकिलाबेन अंबानी की मध्यस्थता से हुए पारिवारिक समझौते के तहत जून 2005 में रिलायंस का बंटवारा हुआ और यहीं से मुकेश और अनिल अंबानी की राहें अलग-अलग हो गईं। लेकिन, यहां से मुकेश अंबानी उन्नति की ओर बढ़े तो अनिल अंबानी का पतन होने लगा।

2008 में अनिल अंबानी दुनिया के छठे सबसे अमीर इंसान थे, लेकिन अब उनका नाम टॉप 100 की लिस्ट में भी नहीं आता है। 2005 में बिजनेस का बंटवारा होने के बाद उन्होंने नई शुरुआत की लेकिन गलत फैसलों से उन्हें गहरे वित्तीय संकट का सामना करना पड़ा।

कर्ज, कैश काऊ और 2 गलत फैसले

दरअसल, जब जून 2005 में रिलायंस इंडस्ट्रीज का बंटवारा हुआ, तो मुकेश अंबानी के हिस्से में 'ऑयल और पेट्रोकेमिकल' यानी O2C बिज़नेस आया, जो रिलायंस समूह की 'कैश काऊ' या कामधेनु कंपनी कह लीजिए। खास बात है कि इस कंपनी से हर रोज़ करोड़ों रुपये का कैश फ्लो आता है, जिसकी बदौलत मुकेश अंबानी ने अपने नए बिजनेस को संचित किया।

वहीं, दूसरी ओर अनिल अंबानी के हिस्से में जो बिज़नेस आए उनमें RCom, Reliance Power, Reliance Infra थे। दरअसल, ये 'कैपिटल-इंटेंसिव' बिजनेस थे यानी इनमें पैसा लगातार लगाना पड़ता था, और कंपनियों को मुनाफा आने में सालों लग जाते थे।

वहीं, कम समय में बहुत सारे अलग-अलग सेक्टर्स में एक साथ घुस जाना भी अनिल अंबानी की सबसे बड़ी गलती थी। उन्होंने टेलीकॉम, पावर, इंफ्रास्ट्रक्चर, डिफेंस, एंटरटेनमेंट और फाइनेंस जैसे हर बड़े सेक्टर में पैर पसारने चाहे। ऐसे में इन बिज़नेस को खड़ा करने के लिए उन्होंने बैंकों और विदेशी संस्थाओं से भारी कर्ज लिया, लेकिन जब इन प्रोजेक्ट्स से रिटर्न नहीं आया, तो वे कर्ज़ के जाल में फंस गए।

कैसे डूबा टेलिकॉम बिजनेस

साल 2003 में RCom भारत की टॉप टेलीकॉम कंपनियों में से एक थी और अपनी नई-नई पेशकश से देश में लोकप्रिय हो रही थी। लेकिन, इस बिजनेस में भी अनिल अंबानी एक बड़ी गलती कर बैठ। दरअसल, उन्होंने दुनिया भर में लोकप्रिय हो रही GSM तकनीक के बजाय पुरानी CDMA तकनीक पर बहुत लंबा समय नष्ट किया। जब तक वे पूरी तरह से GSM में शिफ्ट हुए, तब तक एयरटेल और वोडाफोन बहुत आगे निकल चुके थे। इसके बाद 2016 में मुकेश अंबानी ने 'Jio' के जरिए टेलिकॉम बिजनेस में एंट्री ली और यह RCom के लिए घातक साबित हुई।

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इसके बाद रिलायंस कम्युनिकेशंस (RCOM) ने नवंबर और दिसंबर 2017 से अपनी मुख्य वायरलेस वॉइस और 2G/3G मोबाइल सर्विस बंद कर दीं और बाद में फरवरी 2019 में दिवालियापन के लिए अर्ज़ी दी।