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175 साल पुराना इतिहास: जब नहीं था कच्चा तेल, तब चिड़िया और व्हेल से कैसे रोशन होती थी दुनिया? दिलचस्प है क्रूड की कहानी

Published: Sat, 17 Oct 2026 03:05 PM (IST)

यह लेख कच्चे तेल के व्यापक उपयोग से पहले रोशनी के स्रोतों के दिलचस्प इतिहास पर प्रकाश डालता है, जिसमें ...और पढ़ें

crude oil का इतिहास (AI Image)

crude oil का इतिहास (AI Image)

HighLights

  1. कच्चे तेल से पहले व्हेल के तेल से होती थी रोशनी।

  2. केरोसिन विकास और एडविन ड्रेक के कुएं ने बदला इतिहास।

  3. पेट्रोलियम उद्योग ने वैश्विक अर्थव्यवस्था को दिया नया आयाम।

बिजनेस डेस्क, नई दिल्ली| आज पेट्रोल-डीजल से लेकर प्लास्टिक, केमिकल और कई औद्योगिक उत्पादों तक क्रूड ऑयल ग्लोबल इकॉनमी का अहम हिस्सा है। लेकिन करीब 175 साल पहले, जब अमेरिका में आधुनिक पेट्रोलियम उद्योग का विकास शुरू भी नहीं हुआ था, तब दुनिया के कई हिस्सों में घरों, कारखानों और सड़कों को रोशन करने के लिए अलग-अलग स्रोतों से ईंधन जुटाया जाता था। कहीं व्हेल की चर्बी से तेल बनाया जाता था, कहीं वनस्पति तेल और पशुओं की चर्बी का इस्तेमाल होता था। कुछ दूरदराज के इलाकों में मछलियों और पक्षियों के शरीर की चर्बी से भी रोशनी जलाई जाती थी।

असली बदलाव 19वीं सदी के मध्य में आया, जब तेल को बड़े पैमाने पर निकालने और रिफाइन करके उपयोगी ईंधन बनाने की तकनीक विकसित होने लगी। लेकिन उससे पहले की कहानी बड़ी दिलचस्प है।

व्हेल के तेल से रोशन होते थे घर और कारखाने

19वीं सदी में अमेरिका के कई शहरों में व्हेल का तेल रोशनी का महत्वपूर्ण स्रोत था। व्हेल के शरीर की चर्बी को गर्म करके तेल निकाला जाता था, जिसे विशेष लैम्पों में जलाया जाता था। यह तेल घरों, कारखानों, स्ट्रीट लाइटों, रेलगाड़ियों के कुछ लैम्पों और लाइट पिलर्स में भी इस्तेमाल होता था।

अमेरिकी स्मिथसोनियन नेशनल म्यूजियम ऑफ अमेरिकन हिस्ट्री और नेशनल पार्क सर्विस से पता चलता है कि स्पर्म व्हेल से मिलने वाला स्पर्म ऑयल विशेष रूप से उपयोगी माना जाता था। इसके सिर में मौजूद एक खास गुहा से मिलने वाला मोम जैसा पदार्थ स्पर्मासेटी कहलाता है। इसे प्रोसेस करके हाई क्वालिटी वाला तेल और मोम निकाला जाता था। स्पर्मासेटी से बनने वाली मोमबत्तियां साफ और बेहतर रोशनी के लिए जानी जाती थीं।

व्हेल से मिलने वाले उत्पादों का इस्तेमाल सिर्फ रोशनी तक सीमित नहीं था। इनसे मशीनों को चिकनाई देने वाला तेल, मोमबत्तियां और कुछ अन्य व्यावसायिक उत्पाद भी तैयार किए जाते थे। इस कारोबार ने अमेरिका के न्यू इंग्लैंड क्षेत्र के कई बंदरगाहों और कॉमर्शियल शहरों को आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण बना दिया था। लेकिन व्हेल का तेल महंगा था और इसे हासिल करने के लिए लंबी समुद्री यात्राएं करनी पड़ती थीं। व्हेल की उपलब्धता घटने और शिकार की लागत बढ़ने से इस कारोबार पर दबाव आने लगा। बाद में दूसरे ईंधनों ने इसके बाजार को काफी हद तक पीछे छोड़ दिया।

चिड़ियों और मछलियों से कैसे मिलती थी रोशनी?

व्हेल के अलावा, कुछ समुदायों में पक्षियों और मछलियों के शरीर की चर्बी का भी इस्तेमाल रोशनी के लिए किया जाता था। इसका एक ऐतिहासिक उदाहरण स्कॉटलैंड के ऑर्कनी द्वीप समूह में मिलने वाले स्टॉर्मी पेट्रेल पक्षी से जुड़ा है। कई मीडिया रिपोर्ट्स और पुराने विवरणों के अनुसार, इस पक्षी को सूखाकर शरीर में बाती लगाकर उसे एक साधारण दीपक की तरह इस्तेमाल किया जाता था।

इसी तरह, कुछ क्षेत्रों में मछली के शरीर की चर्बी को जलाया जाता था या मछली को लकड़ी के साथ बांधकर मशाल जैसा बनाया जाता था। ऐसे तरीके स्थानीय परिस्थितियों और उपलब्ध संसाधनों पर निर्भर थे। इनसे मिलने वाली रोशनी सीमित होती थी और धुआं या दुर्गंध भी पैदा हो सकती थी। हालांकि पक्षियों और मछलियों से रोशनी जलाना पूरी दुनिया की लोकप्रिय व्यवस्था नहीं थी। ये कुछ विशेष इलाकों में इस्तेमाल होने वाले पारंपरिक तरीके थे। अधिकांश समाजों में रोशनी के लिए वनस्पति तेल, पशुओं की चर्बी और दूसरे स्थानीय ईंधन भी महत्वपूर्ण थे।

1850 के दशक में आया बड़ा बदलाव

19वीं सदी के मध्य तक इंडस्ट्रियल विकास और शहरों की बढ़ती आबादी के कारण सस्ते और बेहतर प्रकाश ईंधन की मांग बढ़ने लगी थी। इसी दौर में कोयले और ऑयल शेल से केरोसिन जैसा ईंधन बनाने की तकनीक विकसित हुई। कनाडा के भूविज्ञानी अब्राहम गेस्नर ने 1840 के दशक में केरोसिन तैयार करने की प्रक्रिया पर काम किया और 1850 के दशक में इसका व्यावसायिक उत्पादन बढ़ने लगा।

केरोसिन की कहानी केवल 1859 में शुरू नहीं हुई थी। कोयले और अन्य स्रोतों से बनने वाला केरोसिन आधुनिक तेल कुओं के इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट विकास से पहले भी उपलब्ध था। हालांकि, धरती से बड़े पैमाने पर कच्चा तेल निकालने की क्षमता ने आगे चलकर इस ईंधन की आपूर्ति और लागत में बड़ा बदलाव किया।

आधुनिक अमेरिकी में तेल उद्योग का अहम पड़ाव

अमेरिकी तेल इतिहास में 27 अगस्त 1859 की तारीख बेहद महत्वपूर्ण है। इसी दिन एडविन ड्रेक की टीम ने पेनसिल्वेनिया के टाइटसविल के पास एक ऐसा कुआं सफलतापूर्वक पूरा किया, जिसे खास तौर पर तेल निकालने के लिए खोदा गया था। कुएं से करीब 69.5 फीट की गहराई पर तेल मिला।

इसे अमेरिका के आधुनिक व्यावसायिक पेट्रोलियम उद्योग की शुरुआत का प्रमुख पड़ाव माना जाता है। यह दुनिया में पहली बार तेल मिलने की घटना नहीं थी। प्राकृतिक तेल के स्रोत इससे हजारों साल पहले से ज्ञात थे और दूसरे क्षेत्रों में भी तेल निकालने की कोशिशें हो चुकी थीं।

ड्रेक के कुएं के बाद पेनसिल्वेनिया में तेल उत्पादन तेजी से बढ़ा। तेल को रिफाइन करके केरोसिन बनाया जाने लगा, जिसने कई बाजारों में व्हेल के तेल और दूसरे प्रकाश ईंधनों को चुनौती दी। आगे चलकर पेट्रोलियम से मिलने वाले अन्य उत्पादों और आंतरिक दहन इंजन के विकास ने तेल की मांग को रोशनी से कहीं आगे बढ़ा दिया।

कच्चा तेल सिर्फ रोशनी का ईंधन नहीं रहा

शुरुआती दौर में पेट्रोलियम की व्यावसायिक उपयोगिता का बड़ा हिस्सा लैम्पों में जलने वाले ईंधन से जुड़ा था। लेकिन 20वीं सदी में मोटरगाड़ियों, विमानों और औद्योगिक मशीनों के विस्तार के साथ तेल का महत्व तेजी से बढ़ा। पेट्रोल और डीजल परिवहन के प्रमुख ईंधन बने, जबकि पेट्रोकेमिकल उद्योग ने प्लास्टिक, सिंथेटिक फाइबर, सॉल्वेंट और अनेक रसायनों के उत्पादन में इसकी भूमिका बढ़ा दी।

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इस तरह करीब 175 साल पहले शुरू हुआ आधुनिक तेल उद्योग धीरे-धीरे ग्लोबल इकॉनमी के सबसे महत्वपूर्ण सेक्टर में शामिल हो गया। हालांकि, इसकी शुरुआत से पहले भी इंसान रोशनी के लिए प्रकृति से मिलने वाले कई संसाधनों का इस्तेमाल करते थे।