नई दिल्ली, जागरण ब्यूरो। पिछले सवा दो वर्ष से लोग इस बात की उम्मीद लगाए हैं कि पेट्रोल और डीजल को जीएसटी के दायरे में लाने के साथ उनके दाम में कमी आएगी लेकिन मौजूदा स्थिति को देखें तो आम आदमी को इस मोर्चे पर कोई राहत मिलने के संकेत नहीं हैं। GST Council में राज्यों के प्रतिनिधि इन उत्पादों को नई टैक्स व्यवस्था में लाने ही नहीं देना चाह रहे हैं। इसकी वजह यह है कि पेट्रोल और डीजल से राज्यों को बड़ा राजस्व मिलता है, क्योंकि दोनों उत्पादों पर राज्यों द्वारा लगाया जा रहा टैक्स बहुत ज्यादा है। जीएसटी संग्रह की मौजूदा स्थिति को देखते हुए ज्यादातर राज्य पेट्रोल-डीजल से हासिल राजस्व में कोई कमी नहीं चाहते हैं।

वित्त मंत्रालय मोटे तौर पर तो इन दोनों समेत अन्य पेट्रोलियम उत्पादों को जीएसटी के दायरे में लाने के पक्ष में है। लेकिन वह अपनी तरफ से राज्यों पर दबाव बनाने की स्थिति में खुद को नहीं पा रहा है। जीएसटी काउंसिल की पिछली दोनों बैठकों में जब भी इस मुद्दे को उठाने की कोशिश की गई तो राज्यों ने उसे एक सिरे से खारिज किया है। यह भी ध्यान रहे कि पिछले एक वर्ष में भाजपा ने छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, राजस्थान और अब महाराष्ट्र में सत्ता गंवा दी है। चालू वित्त वर्ष के शुरुआती सात महीनों के दौरान जीएसटी संग्रह अनुमान से कम रहा है। ऐसे में पेट्रोलियम उत्पादों को जीएसटी में शामिल होने से उनकी आमदनी का यह स्नोत भी प्रभावित हो जाएगा।

वर्ष 2018-19 में राज्यों को पेट्रोलियम उत्पादों से कुल 2,30,130 करोड़ रुपये का रेवेन्यू आया था जो उससे पिछले वर्ष के मुकाबले 13 फीसद ज्यादा था। इस रेवेन्यू में सबसे बड़ा योगदान पेट्रोल व डीजल से बिक्री कर वसूली का है। अभी पेट्रोल पर राज्यों की तरफ से 17-36 प्रतिशत बिक्री कर या वैट वसूला जाता है, जबकि डीजल पर यह दर 8-18 प्रतिशत तक है।

इसलिए जीएसटी से पेट्रोल-डीजल बाहर

राज्यों के राजस्व में पेट्रोलियम उत्पादों से हासिल कमाई का हिस्सा बहुत ज्यादा है। कुछ राज्यों के कुल राजस्व में पेट्रोलियम उत्पादों से हासिल टैक्स की हिस्सेदारी 60 फीसद तक है। यही वजह है कि राज्य इसकी वसूली केंद्र को देने को तैयार नहीं हुए।

पेट्रोलियम मंत्री भी कर रहे मांग

पेट्रोलियम मंत्री धर्मेद्र प्रधान भी लंबे अरसे से पेट्रोलियम उत्पादों को जीएसटी में शामिल करने की मांग कर चुके हैं। प्रधान पिछले एक वर्ष के दौरान करीब दर्जनभर मौकों पर उम्मीद जता चुके हैं। सड़क परिवहन व राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी भी इस प्रस्ताव का समर्थन कर चुके हैं। लेकिन मौजूदा हालात में उनकी मांग पूरी होने की दूर-दूर तक गुंजाइश नहीं दिख रही है।

क्या बनी थी सहमति

जीएसटी लागू होने के समय यह सहमति बनी थी कि पांच वर्ष बाद इन उत्पादों को जीएसटी में शामिल कर लिया जाएगा। लेकिन अभी राजस्व की जो स्थिति है, उसे देखते हुए ऐसा प्रतीत हो रहा है कि राज्य पांच वर्ष बाद भी पेट्रो उत्पादों को शायद ही जीएसटी में शामिल करने को तैयार हों।

राज्यों का तर्क क्या है

अभी जबकि राज्यों के गैर-पेट्रोलियम उत्पादों से होने वाले राजस्व में भारी कमी हो रही है, तब उन्हें पेट्रोलियम उत्पादों से हो रहे रेवेन्यू से ही मदद मिल रही है। अप्रैल-जून में राज्यों को पेट्रो उत्पादों से मिले 51,600 करोड़ राजस्व में पेट्रोल, डीजल, एटीएफ व गैस की राशि 46,176 करोड़ रुपये की थी।

Posted By: Ankit Kumar

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