नई दिल्ली, जागरण ब्यूरो। कोरोना की दूसरी लहर ने अर्थव्यवस्था के विभिन्न मोर्चों पर परेशानी जरूर पैदा की है, लेकिन राजस्व संग्रह के मोर्चे पर अभी तक कोई बड़ी चुनौती नहीं आई है। ऐसे में भारतीय रिजर्व बैंक ने केंद्र सरकार को सलाह दी है कि तमाम चुनौतियों के बावजूद खर्च को लेकर ज्यादा सतर्कता बरतने की जरूरत है। केंद्र को पूरी कोशिश करनी चाहिए कि आम बजट 2021-22 में राजकोषीय संतुलन का जो रोडमैप पेश किया गया है, उसके हिसाब से 2024-25 तक सकल राजकोषीय घाटे को 4.5 फीसद के लक्ष्य तक समेटने में कोई कोताही नहीं होनी चाहिए। साथ ही तब तक राज्यों का संयुक्त सकल घाटा भी तीन फीसद (राज्यों के सकल घरेलू उत्पाद-एसजीडीपी के सापेक्ष) पर रखने की रणनीति होनी चाहिए। 2020-21 में केंद्र व राज्यों का संयुक्त राजकोषीय घाटा 13 फीसद रहा है।

RBI की तरफ से भारतीय इकोनामी के संदर्भ में सरकारी खर्च की गुणवत्ता पर जारी रिपोर्ट में केंद्र सरकार के साथ ही राज्यों को कई तरह के सुझाव दिए गए हैं। इसका कहना है कि कोरोना महामारी के बाद इकोनामी को मजबूत बनाने की जो कोशिश शुरू होगी, उसमें खर्च की गुणवत्ता के साथ कोई समझौता नहीं होना चाहिए। केंद्र व राज्य दोनों को पूंजीगत खर्चे व इंफ्रास्ट्रक्चर विकास को प्राथमिकता देनी होगी। यह सुझाव भी दिया गया है कि राजस्व की स्थिति को देखते हुए खर्च में आंख मूंद कर कटौती करने के बजाय बड़े सामाजिक लाभ वाले खर्च को बचाए रखने पर भी ध्यान देना चाहिए। कई बार केंद्र या राज्यों की तरफ से सभी तरह की योजनाओं के आवंटन में एक जैसी ही कटौती कर दी जाती है।

रिपोर्ट में उधारी का भी जिक्र है, जो कुल जीडीपी का 90 फीसद हो चुका है। भारत सरकार ने इतनी उधारी पहले कभी नहीं की है। पिछले वित्त वर्ष के दौरान केंद्र सरकार को अनुमान से तकरीबन दोगुनी राशि बाजार से उधारी के तौर पर लेनी पड़ी थी। RBI का सुझाव है कि कर्ज के तौर पर प्राप्त राशि का बड़ा हिस्सा पूंजीगत खर्च (स्वास्थ्य, शिक्षा, परिसंपत्ति निर्माण पर होने वाला व्यय) में लगना चाहिए। RBI के मुताबिक, अगर खर्च की मात्रा की जगह पर इसकी गुणवत्ता पर ज्यादा ध्यान दिया जाए तो एक बड़ी क्रांति की जा सकती है।

मानव संसाधन पर खर्च में बहुत पीछे है देश

RBI की इस रिपोर्ट में सरकार के पिछले कुछ वर्षो के दौरान खर्च की गुणवत्ता का भी एक संक्षिप्त अध्ययन है। खास तौर पर जिस तरह से कोरोना काल के बाद कुल सरकारी खर्च में स्वास्थ्य सेक्टर व दूसरे सामाजिक विकास सेक्टर की हिस्सेदारी को लेकर जो चर्चा हो रही है, उसका भी जिक्र है। यह माना गया है कि जीडीपी की तुलना में मानव संसाधन पर खर्च के मामले में भारत सबसे पिछड़े देशों में से है। 2017 में मानव संसाधन पर भारत ने कुल जीडीपी का सिर्फ सात फीसद खर्च किया था।

भारत ब्रिक्स व अन्य विकासशील देशों से काफी पीछे है। रिपोर्ट के मुताबिक, कोविड ने हमें मौका दिया है कि मानव संसाधन विकास पर होने वाले खर्च की गुणवत्ता को लेकर नए सिरे से विचार किया जाए। उल्लेखनीय है कि वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने तमाम चुनौतियों के बावजूद आम बजट 2021-22 पेश करते हुए अगले पांच वर्षो तक राजकोषीय घाटे को चालू वर्ष के 6.8 फीसद से घटाकर 4.5 फीसद लाने का लक्ष्य रखा है।

Edited By: Ankit Kumar