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भारत का वो उद्योगपति, जिसने एक मिल से शुरू किया सफर, फिर 41 देशों तक पहुंचा कारोबार; विदेश में खड़ा किया साम्राज्य

Published: Thu, 08 Oct 2026 12:24 PM (IST)

इस भारतीय उद्योगपति ने मुश्किल दौर में थाईलैंड से अपना अंतरराष्ट्रीय व्यापार शुरू किया, जहां उन्होंने एक करोड़ की टेक्सटाइल मिल से शुरुआत की।

भारत का वो उद्योगपति, जिसने एक मिल से शुरू किया सफर

भारत का वो उद्योगपति, जिसने एक मिल से शुरू किया सफर

HighLights

  1. थाईलैंड में एक करोड़ की टेक्सटाइल मिल से शुरुआत की।

  2. 1970-80 के दशक में दक्षिण-पूर्व एशिया में 10 कंपनियाँ स्थापित कीं।

  3. आज आदित्य बिड़ला समूह का कारोबार 41 देशों में फैला है।

बिजनेस डेस्क, नई दिल्ली: कभी भारत से बाहर कारोबार करना भारतीय उद्योगपतियों के लिए आसान नहीं था। पैसे की कमी, विदेशी मुद्रा के सख्त नियम और सरकारी पाबंदियां बड़ी रुकावट थीं। लेकिन इन्हीं मुश्किल हालात के बीच एक कारोबारी ने विदेशों में निवेश का रास्ता चुना और धीरे-धीरे ऐसा बिजनेस खड़ा किया कि दूसरे देशों की सरकारें और राष्ट्राध्यक्ष खुद उन्हें निवेश के लिए बुलाने लगे। यह कहानी है उद्योगपति आदित्य बिड़ला (Aditya Birla) की।

थाईलैंड से शुरू हुई विदेश में कारोबार की कहानी

1960 के दशक के आखिर और 1970 के दशक की शुरुआत में थाईलैंड अपनी अर्थव्यवस्था को विदेशी निवेश के लिए खोल रहा था। वहां निवेशकों को 8 साल तक कॉरपोरेट और डिविडेंड टैक्स से छूट मिलती थी। साथ ही कैपिटल इक्विपमेंट के आयात पर भी शुल्क नहीं था। आदित्य बिड़ला ने इसी मौके को पहचाना और विदेश में अपना पहला बड़ा कदम रखा।

1 करोड़ के मिल से हुई शुरुआत

आदित्य विक्रम बिड़ला (aditya Vikram Birla) का पहला अंतरराष्ट्रीय कारोबार 1 करोड़ रुपये की टेक्सटाइल मिल से शुरू हुआ। शुरुआत के कुछ समय के बाद ही थाई एयरवेज (thai airways) से बड़ा ऑर्डर मिला। एयरलाइन ने अपनी एयर होस्टेस की यूनिफार्म के लिए बिड़ला की कंपनी से कपड़ा लिया। इसके बाद यही छोटी शुरुआत आगे बढ़ती गई और थाइलैंड के अलावा इंडोनेशिया और फिलीपींस में भी मिलें स्थापित हुईं। फिलीपींस में भी बिड़ला के कारोबारी रिश्ते मजबूत हुए। वह अपने दादा के पुराने दोस्त और फिलीपींस के राष्ट्रपति फर्डिनेंड मार्कोस से मिले थे। बाद में उन्हें भारत में फिलीपींस का मानद कौंसल भी बनाया गया।

10 साल में खड़ी कर दीं 10 कंपनियां

1970 से 1980 के बीच आदित्य बिड़ला ने दक्षिण-पूर्व एशिया में 10 कंपनियां खड़ी कर दीं। इन कंपनियों की कुल बिक्री करीब 10 करोड़ डॉलर तक पहुंच गई।

1990 के दशक के मध्य तक कारोबार का आकार और बढ़ चुका था। मलेशिया में दुनिया सबसे बड़ी पाम ऑयल रिफाइनरी में उनका कारोबार था और थाइलैंड उनका सबसे बड़ा निवेश केंद्र बन चुका था।

फिलीपींस में लगा बड़ा झटका, लेकिन पीछे नहीं हटे

1986 में बिड़ला (Aditya birla success story) को फिलीपींस में बड़ा नुकसान उठाना पड़ा। फर्डिनेंड और इमेल्डा मार्कोस के देश छोड़ने और कोराजोन एक्विनो के सत्ता में आने के बाद उनकी एक नारियल तेल रिफाइनरी का राष्ट्रीयकरण कर दिया गया। हालांकि उनकी टेक्सटाइल मिल बची रही।

बिड़ला ने इस झटके के बाद भी फिलीपींस से दूरी नहीं बनाई। अर्थव्यवस्था सुधरने के बाद उन्होंने दोबारा वहां निवेश किया। 1987 में उन्होंने 5.5 करोड़ डॉलर के प्रोजेक्ट का ऐलान किया, जिसमें हर साल 23,000 टन रेयॉन फाइबर बनाने की योजना थी। 1991 में उन्होंने वहां अपनी चौथी कंपनी इंडो-फिल कॉर्न केमिकल्स शुरू की।

1990 तक, 1200 करोड़ का विदेशी कारोबार

1990 में बिड़ला के पास थाईलैंड, मलेशिया, इंडोनेशिया और फिलीपींस में 12 कंपनियां थीं। इनका कुल कारोबार कुल 1200 करोड़ रुपये का था। इसके सिर्फ 5 साल बाद, 1995 में उनके कारोबार का विस्तार 14 देशों में 17 कंपनियों तक हो चुका था और कुल बिक्री करीब 5200 करोड़ रुपये पहुंच गई थी।

भारत में भी कम लोगों को पता था विदेशों में कितना बड़ा कारोबार

दिलचस्प बात यह थी कि 1990 के शुरुआती वर्षों तक भारत में बहुत कम लोगों को बिड़ला के विदेशी कारोबार के वास्तविक आकार का अंदाजा था। उस समय MRTP Act, FERA और दूसरे नियमों के कारण विदेशी कारोबार को लेकर काफी पाबंदियां थीं। बिड़ला की ज्यादातर विदेशी कंपनियां निजी तौर पर नियंत्रित थीं। 13 कंपनियों में सिर्फ थाई रेयॉन और थाई कार्बन स्थानीय शेयर बाजार में सूचीबद्ध थीं।

1990 के बाद बिड़ला ने अपने विदेशी कारोबार को ज्यादा खुलकर सामने रखना शुरू किया। उनका दावा था कि अमेरिकी, जापानी, यूरोपीय और दक्षिण-पूर्व एशियाई कंपनियों से मुकाबले के बावजूद उनका ग्रुप अच्छा मुनाफा कमा रहा था। उन्होंने बताया था कि पिछले साल 50 से 100 फीसदी तक डिविडेंड दिया गया था।

दूसरी सबसे बड़ी कंपनी

1993 के बिजनेस वर्ल्ड सर्वे में ग्रासिम भारत की दूसरी सबसे अमीर कंपनी और हिंडाल्को छठी सबसे अमीर कंपनी थी। बिड़ला की रणनीति सीधी थी कि वही बिजनेस विदेश ले जाना, जिसकी उन्हें भारत में अच्छी समझ थी। 1966 में उन्होंने इंडियन रेयॉन का अधिग्रहण किया। 1969 में 1 करोड़ रुपये की लागत से 12,768 स्पिंडल वाली इंडो-थाई सिंथेटिक्स बनाई। 1974 में ग्रासिम के रेयॉन कारोबार को आगे बढ़ाते हुए थाई रेयॉन की स्थापना की गई।

कार्बन ब्लैक से बनी ग्लोबल पहचान

1988 में बिड़ला ने इंडियन रेयॉन के कारोबार में कार्बन ब्लैक को जोड़ा। भारत में शुरुआत 20,000 टन सालाना क्षमता से हुई, जिसे 1989 में बढ़ाकर 50,000 टन कर दिया गया। इसके बाद थाईलैंड और मिस्र में प्लांट लगाए गए और बिड़ला इस क्षेत्र में दुनिया के छठे सबसे बड़े निर्माता बन गए। बाद में पोलैंड और रोमानिया में भी कार्बन ब्लैक प्लांट लगाने के प्रस्ताव मिले।

कामयाबी ऐसी मिली कि सरकारें खुद बुलाने लगीं

बिड़ला की विदेशों में सफलता की चर्चा बढ़ी तो कई देशों की सरकारों ने उन्हें अपने यहां निवेश के लिए आमंत्रित करना शुरू किया। फरवरी 1993 में भूटान के राजा भारत आए। उनकी नजर भूटान के चूना पत्थर के भंडार पर थी और वह चाहते थे कि कोई भारतीय कारोबारी वहां सीमेंट प्लांट लगाए। संभावित निवेशकों में आदित्य बिड़ला और गुजरात अंबुजा सीमेंट के सुरेश नेवतिया का नाम था।

नवंबर 1994 में थाई प्रधानमंत्री चुआन लीकपाई बिड़ला को थाईलैंड में ग्रुप की मौजूदगी के 25 साल पूरे होने पर बधाई देने पहुंचे। भूटान के राजा भले ही निवेश लेकर नहीं लौटे, लेकिन थाई प्रधानमंत्री 40 करोड़ डॉलर के नए निवेश के वादे के साथ लौटे।

इसके बाद रूस से भी प्रस्ताव आया। वहां 1.20 लाख टन क्षमता वाला पल्प प्लांट बिक्री के लिए उपलब्ध था। प्लांट में करीब 700 कर्मचारी थे और यह चार महीने से बंद पड़ा था। दिसंबर 1994 में बिड़ला समूह ने रूस में प्रवेश का ऐलान किया। उस समय भारत में भी उनकी उत्पादन क्षमता करीब 1.20 लाख टन थी। यानी रूस का प्लांट खरीदने से क्षमता एक झटके में लगभग दोगुनी हो सकती थी।

आज 41 देशों में फैला है कारोबार

आज आदित्य बिड़ला ग्रुप भारत के बड़े कॉरपोरेट समूहों में शामिल है। ग्रुप का कारोबार दुनिया के 40 से ज्यादा देशों में फैला हुआ है और इसका विस्तार अमेरिका, यूरोप, एशिया और अफ्रीका तक है। ग्रुप का कुल राजस्व करीब 67 से 70 अरब डॉलर बताया जाता है और इसमें 50 फीसदी से ज्यादा हिस्सा भारत के बाहर के कारोबार से आता है।

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