नई दिल्ली। दिल्ली में सरकार बनाने जा रही आम आदमी पार्टी (आप) के चुनावी एजेंडे में भले ही कई आर्थिक सुधार विरोधी वादे हों, लेकिन इंडिया इंक इसे फिलहाल विरोध नहीं मान रहा है। विदेशी मल्टी ब्रांड रिटेल कंपनियों को दिल्ली में दुकान नहीं खोलने देने और बिजली की दरों में कटौती जैसे वादे पर प्रमुख उद्योग चैंबर फिक्की के नए अध्यक्ष सिद्धार्थ बिड़ला का कहना है कि पहले 'आप' को नीतियां स्पष्ट करने दीजिए, उसके बाद ही उसे सुधार समर्थक या सुधार विरोधी कहा जा सकेगा। देश के आर्थिक-राजनीतिक हालात पर उन्होंने 'दैनिक जागरण के विशेष संवाददाता जयप्रकाश रंजन' से बेबाक बातचीत की।

मौजूदा राजनीतिक माहौल को अर्थव्यवस्था के लिहाज से कैसे देखते हैं?

अभी जो माहौल है वह काफी चर्चा का विषय बना हुआ है। इन सरगर्मियों का देश की अर्थव्यवस्था पर गहरा असर पड़ेगा। मगर मैं एक बात कहना चाहता हूं कि आर्थिक नीतियों को लेकर देश की सभी बड़ी-छोटी, राष्ट्रीय-क्षेत्रीय पार्टियों के बीच काफी हद तक एकराय है। कुछ मुद्दों को छोड़ दीजिए तो वाम दल भी तमाम आर्थिक नीतियों पर अन्य राजनीतिक दलों के समान ही राय रखते हैं। हाल ही में राहुल गांधी ने फिक्की को संबोधित करते हुए कांग्रेस पार्टी की आर्थिक सोच को हमारे सामने रखा। इसकी सराहना की जानी चाहिए। इसी तरह से भाजपा की आर्थिक नीतियां भी काफी सकारात्मक हैं। उद्योग जगत सिर्फ राजनीतिक स्थिरता चाहता है।

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कई अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों ने नरेंद्र मोदी के पीएम बनने पर आर्थिक स्थिति में सुधार की बात कही है, आप इसे कैसे देखते हैं?

किस पार्टी का लीडर कौन बनता है, हम इस पर टिप्पणी नहीं करेंगे। हम सिर्फ यही चाहते हैं कि जो भी सरकार बने वह अपने वादे व नीतियों को लागू करके दिखाए। यह भी याद रखिए कि अब सिर्फ केंद्र में सत्ता परिवर्तन से बात नहीं बनेगी। आर्थिक नीतियों को लागू करने का बहुत सारा दारोमदार राज्यों पर भी है। वैसे, पार्टी कोई भी हो अगर देश विकास कर रहा है तो हमें किसी से कोई एतराज नहीं। यह भी याद रखिए कि रेटिंग एजेंसी को इतना ज्ञान होता तो वर्ष 2008 का ग्लोबल वित्तीय संकट नहीं आता।

आम आदमी पार्टी के कई चुनावी वादों को आर्थिक सुधार विरोधी माना जा रहा है, आपकी टिप्पणी?

लोकतांत्रिक तरीके से विजयी हर दल का स्वागत किया जाना चाहिए। 'आप' किसी एक के हित को मार कर दूसरे को नुकसान पहुंचाने की बात नहीं कर रही। वह मौजूदा सिस्टम को बेहतर करने की बात कह रही है। मल्टी ब्रांड रिटेल में एफडीआइ को लेकर राज्यों को जो अधिकार मिला है वह उसी के तहत कदम उठाने की बात कह रहे हैं। इसे सुधार विरोधी नहीं कहा जा सकता।

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