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नई दिल्ली, बिजनेस डेस्क। देश की अर्थव्यवस्था के मंदी में जाने की चर्चाओं के बीच घरेलू बाजार में मांग बढ़ाने को सस्ते कर्ज का रास्ता बनाया जा रहा है। हालांकि, नकदी के इस प्रवाह को बनाए रखने के लिए जरूरी है कि बैंकों की डिपॉजिट लागत में भी संतुलन बना रहे। इस दिशा में स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (एसबीआइ) की एक ताजा रिपोर्ट कहती है कि अब वक्त आ गया है कि बल्क डिपॉजिट पर ब्याज की दर को रेपो रेट से जोड़ दिया जाए।देश में दो करोड़ रुपये से अधिक की एकल जमा राशि को बल्क डिपॉजिट माना जाता है। इस तरह के डिपॉजिट पर बैंकों के पास अभी तक अपने विवेक से ब्याज की दर तय करने का अधिकार है।

एसबीआइ के ग्रुप चीफ इकोनॉमिक एडवाइजर डॉ. सौम्य कांति घोष का मानना है कि इस तरह के डिपॉजिट पर सभी बैंकों की एक ब्याज दर हो और उसे लागू करवाने की जिम्मेदारी रेगुलेटर यानी रिजर्व बैंक पर हो। बैंकिंग सेक्टर के कुल डिपॉजिट में बल्क डिपॉजिट की हिस्सेदारी करीब 30 फीसद की है। इनमें भी अधिकांश डिपॉजिट संस्थाओं का है। घोष का मानना है कि इन संस्थाओं को ब्याज का खतरा (रिस्क) उठाना चाहिए ताकि खुदरा जमाकर्ताओं (रिटेल डिपॉजिटर) को इस खतरे से अलग रखा जा सके।गौरतलब है कि इकोनॉमी के विभिन्न सेक्टरों में मांग की कमी के चलते मंदी की स्थिति बन रही है। ऑटोमोबाइल, एफएमसीजी, टेक्सटाइल, टेलीविजन-एसी जैसी इलेक्ट्रॉनिक वस्तुओं में बिक्री लगातार कम हो रही है।

आने वाले त्योहारी सीजन में इन उत्पादों की मांग बढ़ाने के उद्देश्य से बैंकों ने अब कंज्यूमर, ऑटो लोन आदि में ब्याज दरों में कमी का सिलसिला शुरू किया है। अर्थशास्त्रियों का मानना है कि बैंकों को अगर कर्ज सस्ता देना है तो उनकी डिपॉजिट की दरों को भी उसी के अनुरूप करना होगा, ताकि लागत नीचे लाई जा सके।

नहीं मिलता रेपो रेट में कटौती का लाभ

रिपोर्ट के मुताबिक रिजर्व बैंक लगातार चार बार रेपो रेट में कमी कर चुका है। जनवरी से जुलाई 2019 के दौरान रेपो दर 110 आधार अंक घटकर 6.50 फीसद से 5.40 फीसद पर आ गई है। वहीं, बैंक अब तक 40 आधार अंक का लाभ ही ग्राहकों को दे पाए हैं। बैंक अपनी जमा दरों को कर्ज की दरों के मुताबिक इसलिए नहीं बदलते क्योंकि उन्हें कारोबार का एक बड़ा हिस्सा खोने का डर होता है। इसलिए डॉ. घोष के मुताबिक इसका एकमात्र रास्ता यही है कि रिजर्व बैंक बल्क डिपॉजिट पर मिलने वाली ब्याज की दर को रेपो से लिंक करना अनिवार्य कर दे। कोई बैंक इस मामले में पहल करना नहीं चाहता इसलिए रिजर्व बैंक का इसमें दखल देना आवश्यक है।

छोटी बचत योजनाओं को अलग रखने की जरूरत

डॉ. घोष की राय है कि बैंक जमा दर को छोटी बचत योजनाओं के साथ जोड़कर भी नहीं देखा जाना चाहिए। वित्त वर्ष 2019 में बैंक जमा में 11.5 लाख करोड़ रुपये की वृद्धि हुई है। वहीं, लघु बचत जमा में 1.25 लाख करोड़ रुपये की बढ़ोतरी हुई है। यह बैंक जमा में हुई कुल वृद्धि का मात्र 11 फीसद है। डॉ. घोष का मानना है कि बैंकों को संसाधन जुटाने के लिए डिपॉजिट रेट बढ़ाने के बजाय वैल्यू एडेड प्रोडक्ट का विकल्प ग्राहकों के सामने रखना चाहिए। इससे बैंकों को कम दरों पर भी संसाधन जुटाने में मदद मिलेगी।

Posted By: Pawan Jayaswal

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