नई दिल्ली (जेएनएन)। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने हाल ही में शरीया कानून के सिद्धांतों पर चलने वाली इस्लामिक बैंकिंग व्यवस्था शुरू करने के प्रस्ताव पर आगे न बढ़ने का फैसला किया है। आरबीआई ने अपने फैसले पर तर्क देते हुए कहा था कि सभी लोगों के सामने बैंकिंग एवं वित्तीय सेवाओं के समान अवसर पर विचार करने के बाद ही यह निर्णय लिया गया है। हम अपनी इस खबर में आपको बताने की कोशिश करेंगे कि आखिरी इस्लामिक बैंकिंग कहते किसे हैं और फिलहाल कितने देशों में काम कर रही है।

क्या है इस्लामिक बैंक: इस्लामी कानून यानी शरिया के सिद्धांतों पर काम करने वाली बैंकिंग व्यवस्था को इस्लामिक बैंकिंग कहा जाता है। इन बैंकों की खासियत यह है कि इनमें किसी तरह का ब्याज न तो लिया जाता है और न ही दिया जाता है। इसमें बैंक को होने वाले लाभ को इसके खाताधारकों में बांट दिया जाता है। नियम के मुताबिक, इन बैंकों के पैसे गैर इस्लामी कार्यों में नहीं लगाए जा सकते।

आधुनिक दुनिया में इस्लामी बैंकिंग: दुनिया के 75 देशों में 350 इस्लामी वित्तीय संस्थान संचालित हैं। आधुनिक इस्लामी बैंकिंग प्रणाली की शुरूआत 1963 में अहमद अल नज़र ने मिस्र में की थी। वहीं दुबई इस्लामिक बैंकिंग की शुरुआत साल 1975 में की गई। यह पहला ऐसा इस्लामिक बैंक माना जाता है जिसने इस्लामिक अर्थशास्त्र के सिद्धांतों को अपने अभ्यास में शामिल किया है।

कैसे काम करता है इस्लामिक बैंक:
इस्लामिक बैंकिंग के अंतर्गत इस तरह के खाते खोले जा सकते हैं...

• सेविंग अकाउंट
• इन्वेस्टमेंट अकाउंट
• जक़ात अकाउंट

इस्लामी बैंकिंग में, एक ग्राहक अपने पैसे को एक विशिष्ट खाते में जमा करवाता है और बैंक ग्राहक के पैसे वापस करने की गारंटी देता है, लेकिन सेविंग अकाउंट पर कोई भी ब्याज नहीं दिया जाता है। बैंक ग्राहक का पैसा रखने के लिए इस पर कोई चार्ज लगा सकता है और बैंक उसे उपहार स्वरूप अपने ग्राहक को लौटा सकता है। बैंक ग्राहकों को मांग के आधार पर पैसे निकालने की अनुमति है।

मुधाराबाह (प्रॉफिट शेयरिंग): मुधाराबाह दो पार्टियों (निवेशक और उद्यमी) के बीच प्रॉफिट शेयरिंग के तहत किया गया एक करार होता है। इस्लामिक बैंकिंग के अंतर्गत निवेशक बिजनेस वेंचर के लिए उद्यमों को पैसा देता है और इस पर मिलने वाला रिटर्न लाभ पर आधारित होता है। इस पर आनुपातिक हिस्सेदारी के बारे में पहले ही सहमति बना ली जाती है। यह दो तरह से काम करता है, पहला जब बैंक उद्यमी की भूमिका में होता है और कस्टमर पूंजी उपलब्ध करवाने वाला होता है। वहीं दूसरी तरफ जब बैंक पूंजी उपलब्ध करवाता है तब बैंक ग्राहक उद्यमी की भूमिका में होता है।

मुशरकाह (ज्वाइंट वेंचर): मुशरकाह लाभ बनाने के लिए साझेदारी या संयुक्त व्यापार उद्यम का उल्लेख करता है। इसमें सभी सहयोगी एक व्यावसायिक गतिविधि करने के लिए पूंजी का योगदान करते हैं। इसके सभी साझेदार प्रॉफिट को पहले से तय अनुपात में बांट लेते हैं। जबकि नुकसान में भी अंशदान के हिसाब से साझेदारी करनी पड़ती है।

बाई बिथा मन अजिल (अस्थगित भुगतान पैमाना): यह पारंपरिक बैंकिंग सिस्टम की ही तरह आसान मासिक किस्त (ईएमआई) योजनाओं की तरह काम करती है। ग्राहक इस पैसे का इस्तेमाल पर्याप्त मूल्य की संपत्ति खरीद में कर सकते हैं, जिसके जरिए वो भविष्य में नकदी प्राप्त कर सकें। इस समझौते में, ग्राहक को संपत्ति मिलती है और उसे किश्तों में सहमति के अनुसार भुगतान करना पड़ता है।

कर्द (ब्याज रहित लोन): इस समझौते के तहत किसी भी रिटर्न या मुनाफे की उम्मीद किए बिना एक जरूरतमंद व्यक्ति को ऋण दिया जाता है। इस सूरत में उधार लेने वाले व्यक्ति को सिर्फ मूल धन ही चुकाना होता है, हालांकि अगर कर्जदार चाहे तो वो अपनी स्वेच्छा से बैंक को कुछ अतिरिक्त पैसों की अदायगी कर सकता है।

हिबाह (उपहार): हिबाह लाभ प्राप्त करने के बदले में स्वेच्छा से किए गए भुगतान का उल्लेख करता है। बैंक आमतौर पर लाभ के लिए ऐसा करते हैं, जिसे ग्राहकों के बचत खाते से प्राप्त किया जाता है। हालांकि ब्याज शामिल होने के कारण इसकी गारंटी नहीं दी जा सकता है।

Posted By: Praveen Dwivedi