वीटीआर में संवर रहा लुप्त हो रहे गिद्धों का संसार, गोनौली में बना देश का नौवां संरक्षण केंद्र
वाल्मीकि टाइगर रिजर्व (वीटीआर) में गिद्धों के संरक्षण और संवर्धन के लिए गोनौली में देश का नौवां केंद्र स्थापित किया ...और पढ़ें

गोनौली में बना देश का नौवां संरक्षण केंद्र (एआई जेनरेटेड तस्वीर)
HighLights
वीटीआर में गिद्धों के संरक्षण पर विशेष ध्यान।
गोनौली में देश का नौवां गिद्ध संरक्षण केंद्र स्थापित।
उत्तर प्रदेश, नेपाल से भी गिद्धों का आगमन।
शशि कुमार मिश्र, बेतिया। वाल्मीकि टाइगर रिजर्व (वीटीआर) में बाघ, तेंदुआ, हिरण और गौर के साथ अब गिद्धों के संरक्षण पर भी विशेष ध्यान दिया जा रहा है। पक्षियों की 300 से अधिक प्रजातियों वाले रिजर्व में संकटग्रस्त गिद्धों के संरक्षण और संवर्धन के लिए गोनौली वन प्रक्षेत्र में पहल हुई है।
पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने प्रगति यात्रा के दौरान इसका शिलान्यास किया था। अब अपने स्वरूप में आ गया है। इसके तहत उनकी सुरक्षा, अनुकूल वातावरण तैयार करने और संख्या बढ़ाने की दिशा में काम किया जा रहा है।
देश का नौवां संरक्षण केंद्र
वीटीआर प्रशासन के अनुसार, फिलहाल गिद्धों के घोंसले मुख्य रूप से कोर क्षेत्र में पाए जा रहे हैं। संरक्षण के प्रयास सफल रहे तो आने वाले चार-पांच वर्षों में बफर क्षेत्र में भी उनकी मौजूदगी बढ़ने की उम्मीद है। यह देश का नौवां संरक्षण केंद्र होगा।
इस काम में वीटीआर के फील्ड बायोलॉजिस्ट और पशु चिकित्सक की भूमिका महत्वपूर्ण है। यहां उत्तर प्रदेश के महाराजगंज स्थित सोहगीबरवा (जटायु संरक्षण केंद्र) और नेपाल के चितवन से भी गिद्ध पहुंच रहे हैं। इनमें व्हाइट रम्पेड, इंडियन वल्चर, स्लेंडर बिल्ड, रेड हेडेड वल्चर, इजिप्टियन, हिमालयन ग्रिफान, यूरेशियन ग्रिफान प्रमुख हैं। यहां गिद्धों की संख्या 200 से अधिक है।
वीटीआर के अलावा देश में गिद्ध संरक्षण केंद्र हरियाणा के पिंजौर, बंगाल के राजाभातखावा, असम के रानी, मध्य प्रदेश के केरवा, गुजरात के सक्करबाग चिड़ियाघर और जूनागढ़, ओडिशा के नंदनकानन चिड़ियाघर, भुवनेश्वर, तेलंगना के नेहरू प्राणी उद्यान, हैदराबाद और झारखंड के मुटा, रांची में स्थापित हैं। यहां संरक्षण के अलावा उनके प्रजनन पर भी काम किया जाता है।
क्षेत्र में मरे हुए वन्य जीवों पर रखा जा रहा है ध्यान
जानकारों के अनुसार पूर्व में गिद्धों की संख्या में लगातार गिरावट हुई और आज यह प्रजाति संकटग्रस्त श्रेणी में पहुंच चुकी है। इसके पीछे पशुओं को कुछ प्रतिबंधित दवाओं के सेवन कराने से हुई मौत के बाद गिद्धों के द्वारा इसे खाने को लेकर इसकी संख्या घटी है।
वर्तमान में यहां के गिद्धों के लिए ऐसी व्यवस्था की जा रही है ताकि वह केवल मरे हुए वन्य जीवों के लाशों को खा सके। बाहरी पशुओं के खाने की स्थिति में गिद्धों के अस्तित्व पर संकट की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। हालांकि इन दवाओं के उपयोग पर प्रतिबंध लगा दिया गया है। बावजूद इसके बाहरी मरे हुए पशुओं के अवशेषों पर ध्यान दिया जा रहा है।
वीटीआर में गिद्धों के संरक्षण पर काम किया जा रहा है। पहले चरण में उनकी संख्या बढ़ाने पर विशेष ध्यान है। फिर आगे की पहल होगी। - गौरव ओझा, क्षेत्र निदेशक, वाल्मीकि टाइगर रिजर्व
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