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बिहार में थारू समाज की अनोखी दीपावली, न पटाखों का शोर और न दिखावा, प्रकृति में देखते हैं लक्ष्मी का रूप

Published: Wed, 04 Nov 2026 06:30 AM (IST)

Traditional Diwali: बिहार में थारू जनजाति प्रकृति और वन्यजीवों के प्रति संवेदनशीलता के साथ अनोखी दीपावली मनाती है। वे प्रकृति ...और पढ़ें

पश्चिम चंपारण में डेहरी व घर की लिपाई-पोताई करतीं थारू महिलाएं। सौ. ग्रामीण

पश्चिम चंपारण में डेहरी व घर की लिपाई-पोताई करतीं थारू महिलाएं। सौ. ग्रामीण

HighLights

  1. थारू जनजाति की दीपावली प्रकृति संरक्षण और वन्यजीवों पर केंद्रित।

  2. प्रकृति को लक्ष्मी मानकर पूजते हैं, आतिशबाजी से पूरी तरह परहेज।

  3. तीन दिवसीय उत्सव में पूर्वजों, पशुओं और कृषि यंत्रों की पूजा।

प्रभात मिश्र, नरकटियागंज (पश्चिम चंपारण)। पर्यावरण संरक्षण और वन्यजीवों के प्रति संवेदनशीलता के साथ दीपावली मनाने की परंपरा थारू जनजाति की विशिष्ट पहचान है। इनके लिए प्रकृति ही धन है, समाज लक्ष्मी के रूप में प्रकृति को पूजता है।

प्रकृति के अंश स्वरूप में अग्नि, जल, पेड़, पूर्वज, हवा, पशु की पूजा करते हैं। यह तीन दिनों तक चलने वाला उत्सव है। दीपावली से एक दिन पहले यम दियरी (दीवारी) होती है, इसमें पूर्वजों की पूजा करते हैं, उनके नाम पर दीया जलाते और स्मरण करते हैं।

दीपावली के दिन मां लक्ष्मी के रूप में प्रकृति के प्रति श्रद्धा अर्पित करते हैं, जबकि अगले दिन पशु और कृषि यंत्रों को पूजते हैं। इस दिन पशुओं को नहलाते-सजाते हैं। उनकी प्रदर्शनी भी लगाई जाती है।

इस दौरान समाज के लोग आतिशबाजी से परहेज करते हैं और पेड़-पौधों को जीवन का आधार मानकर उनकी पूजा करते हैं। थारू समाज में दीपावली से दो-तीन सप्ताह पहले ही घर-आंगन की सफाई शुरू हो जाती है।

पीली मिट्टी और गोबर के घोल में नीम की पत्तियों का पानी मिलाकर घरों की दीवारों और आंगन की लिपाई की जाती है। इससे स्वच्छता के साथ कीड़े-मकोड़ों से बचाव भी होता है। उनका मानना है कि बरसात में विषैले जीवों का प्रभाव हो जाता है, इसे प्रभावहीन करने के लिए गोबर और नीम के पत्तों का पानी कारगर होता है।

दरवाजों पर रंगोली बनाई जाती है। दीपावली की रात लक्ष्मी-गणेश के सामने घी के दीप जलाए जाते हैं। एक सप्ताह पहले से ही मांसाहारी व्यंजन बंद हो जाता है। सफाई के साथ दिवाली की तैयारी में थारू समाज के घरों का माहौल बदल जाता है।

दयाशंकर पटवारी ने बताया कि हम थारू समाज के लोग जंगल से जुड़े रहे हैं। प्रकृति ने हमें सुंदर आबोहवा दिया है। वन्यजीवों और वन संपदा को धरोहर मानते हैं। प्रकृति से जुड़ाव का यह मुख्य वजह है।

 स्वच्छ वातावरण बनाए रखने में महिलाओं की महत्वपूर्ण भूमिका

चंद्रकिशोर महतो का कहना है कि सरकार महिला सशक्तिकरण की दिशा में जो प्रयास शुरू की है, हमारा समाज पीढ़ियों से महिला को बराबरी का दर्जा देता रहा है। घर परिवार को चलाने, स्वच्छ वातावरण बनाए रखने में लक्ष्मी स्वरूप महिलाओं की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।

प्रकृति की पूजा ही परंपरा

ईशा देवी ने बताया कि दीपावली को धूमधाम और परंपरागत तरीके से मनाते हैं। दीपावली की रात अपने अपने घरों में हीं पूजा करते हैं। एक दूसरे के घर नहीं जाते हैं। लक्ष्मी के रूप में प्रकृति की पूजा हमारी परंपरा है।

लक्ष्मी के सम्मान में प्रकृति पूजा 

जानकी देवी ने बताया कि थरूहट में छोटी-छोटी अनेक नदियां हैं। जंगल है। सोफा और सुभद्रा मंदिर प्रसिद्ध धार्मिक स्थल हैं। प्रकृति ने बहुत कुछ दिया है। लक्ष्मी के सम्मान में प्रकृति पूजा करते हैं।

मीरा कुमारी ने बताया कि अतिथियों का सम्मान और घरों की साफ-सफाई थरूहट की पहचान है। समाज में विवाद की गुंजाइश अन्य समाज से काफी कम है। वन्यजीवों का खास ख्याल रखा जाता है।

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