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पितरों को तर्पण देने से मन को कितना मिलता है सुकून, गयाजी में मनोवैज्ञानिक तलाश रहे जवाब

Published: Fri, 09 Oct 2026 01:48 PM (IST)

Gaya Pind Daan Research : पश्चिम चंपारण के एमजेके कॉलेज के मनोविज्ञान विभाग के डॉ. विकास कुमार के नेतृत्व में ...और पढ़ें

नदी के तट पर पिंडदान करते तर्पणार्थियों से बात करते शोधार्थी । सौ. स्वयं

नदी के तट पर पिंडदान करते तर्पणार्थियों से बात करते शोधार्थी । सौ. स्वयं 

HighLights

  1. डॉ. विकास कुमार के नेतृत्व में टीम कर रही मनोवैज्ञानिक अध्ययन।

  2. तर्पण-पिंडदान के मानसिक प्रभावों को समझने का प्रयास जारी।

  3. 250 पिंडदानियों और 100 अन्य लोगों से संवाद किया गया।

संदेश तिवारी, बेतिया (पश्चिम चंपारण)। Psychological Impact of Tarpan : पितृपक्ष में गयाजी पहुंचकर तर्पण और पिंडदान के बाद मन की अनुभूतियों पर शोध हो रहा। यह अनुष्ठान अपने को खोने के दुख से उबरने में कितना सहयोग करता है या पितरों की स्मृतियों से जुड़ना व्यक्ति को मानसिक रूप से कैसे मजबूत बनाता है, इन सभी के अनुभव पर बात हो रही।

पश्चिम चंपारण के एमजेके कालेज के मनोविज्ञान विभाग के प्राध्यापक डा. विकास कुमार के नेतृत्व में 15 सदस्यीय टीम गयाजी में पितृपक्ष मेले के दौरान तर्पण-पिंडदान के मनोवैज्ञानिक प्रभावों का अध्ययन कर रही है।

भारतीय सामाजिक अनुसंधान परिषद, नई दिल्ली के मार्गदर्शन से चल रहे शोध में यह समझने का प्रयास किया जा रहा कि तर्पण और पिंडदान जैसी धार्मिक प्रक्रियाओं से व्यक्ति की मानसिक स्थिति पर क्या प्रभाव पड़ता है।

डा. विकास बताते हैं कि सभी धर्मों में मौजूद धार्मिक व्यवहारों के पीछे मानव कल्याण का उद्देश्य होता है। इसी विचार से तर्पण को किसी अपने के निधन से उत्पन्न दुख और क्षति से उबरने के माध्यम के रूप में देखने की शुरुआत हुई।

किसी स्वजन को खोने के बाद व्यक्ति दुख और मानसिक पीड़ा से गुजरता है। ऐसी स्थिति में वह सामाजिक, धार्मिक और व्यक्तिगत स्तर पर कई उपाय अपनाता है।

टीम यह जानने का प्रयास कर रही कि तर्पण की प्रक्रिया व्यक्ति को अपने दुख को स्वीकार करने, उबरने और मानसिक रूप से स्वयं को संभालने में किस हद तक मदद करती है। शोध का उद्देश्य केवल यह समझने के लिए है कि तर्पण के दौरान कौन-कौन सी मनोवैज्ञानिक प्रक्रियाएं व्यक्ति को बेहतर महसूस कराने में सहायक हैं।

Research in Gayaji Bihar

250 पिंडदानियों से संवाद

शोध के लिए गाजीपुर, गोरखपुर, चतरा, पश्चिम चंपारण समेत अन्य राज्यों के 250 पिंडदानियों से संवाद किया गया है। इसके अलावा पंडा समाज, प्रशासन, स्वयंसेवी संस्थाओं और व्यवसाय से जुड़े करीब 100 लोगों का भी साक्षात्कार लिया जा रहा है। इससे पितृपक्ष मेले के धार्मिक के साथ इसके सामाजिक, व्यवस्थागत और पर्यटन संबंधी प्रभावों को भी समझने का प्रयास किया जा रहा है।

शोध की प्रश्नावली में श्रद्धालुओं से उनकी मानसिक स्थिति को लेकर सवाल हैं। मसलन, वे भविष्य के लिए कितने आशान्वित हैं, खुद को कितना उपयोगी और शांत महसूस करते हैं, दूसरे लोगों में उनकी रुचि कैसी है। माता-पिता और पूर्वजों से जुड़ीं स्मृतियों, गयाजी प्रवास के दौरान भावनाओं और मन में चल रही बातों को भी दर्ज किया जा रहा है।

कई विश्वविद्यालयों के शोधार्थी जुड़े

टीम में मगध विश्वविद्यालय, बोधगया और हरियाणा केंद्रीय विश्वविद्यालय के शोधार्थी हैं। इनके अलावा एसएम कालेज, भागलपुर के डा. मिथिलेश तिवारी, टीएनबी कालेज, भागलपुर की डा. श्वेता पाठक, मगध विश्वविद्यालय के मनोविज्ञान विभाग के डा. रवींद्र सिंह तथा हरनौत कालेज के मनोविज्ञान विभाग के डा. अभिषेक कुमार हैं।

शोध कार्य 11 अक्टूबर तक चलेगा। इसके बाद जुटाए गए आंकड़ों का विश्लेषण और शोध की अन्य प्रक्रियाएं पूरी की जाएंगी। पूर्ण परिणाम अगले वर्ष मार्च-अप्रैल तक आने की संभावना है।

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