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दिव्यांगता को मात देकर अमृता प्रीतम बनीं प्रेरणा, बगहा के बच्चों को दे रहीं उज्ज्वल भविष्य

Published: Wed, 14 Oct 2026 03:22 PM (IST)

Divyang Teacher Success Story:पांच साल की उम्र में पोलियो से दिव्यांग होने के बावजूद अमृता प्रीतम ने हिम्मत नहीं हारी ...और पढ़ें

अमृता पिछले 19 वर्षों से बगहा दो प्रखंड के राजकीय प्राथमिक विद्यालय ठाढ़ी में पदस्थापित हैं।

अमृता पिछले 19 वर्षों से बगहा दो प्रखंड के राजकीय प्राथमिक विद्यालय ठाढ़ी में पदस्थापित हैं।

HighLights

  1. पांच साल की उम्र में पोलियो से हुईं दिव्यांग।

  2. 19 वर्षों से बगहा में शिक्षिका के रूप में कार्यरत।

  3. बच्चों को मुफ्त शिक्षा देकर संवार रहीं भविष्य।

संवाद सहयोगी, बगहा (पश्चिम चंपारण)। Amrita Pritam Teacher: महज पांच साल की उम्र में पोलियो के कारण दोनों पैर प्रभावित होने के बावजूद अमृता प्रीतम का हौसला नहीं डगमगाया।

सभी शारीरिक चुनौतियों का सामना करते हुए उन्होंने न केवल अपनी पढ़ाई पूरी की, बल्कि समाजशास्त्र में स्नातक की डिग्री हासिल की।

अमृता पिछले 19 वर्षों से बगहा दो प्रखंड के राजकीय प्राथमिक विद्यालय ठाढ़ी में शिक्षिका के रूप में पदस्थापित हैं और नौनिहालों का भविष्य संवारने में जुटी हैं।

परिवार बना सबसे बड़ी ढाल

बचपन में पोलियो ग्रसित होने के बाद अमृता के माता-पिता रामबहादुर सिन्हा और प्रियंबदा सिन्हा ने उनके बेहतर इलाज के लिए हरसंभव प्रयास किए। पिता स्थानीय उच्च विद्यालय में शिक्षक थे, जिन्होंने अमृता और उनकी बड़ी बहन समेत सभी बच्चों की पढ़ाई पर विशेष ध्यान दिया।

शिक्षण के इस पावन कार्य में अमृता के पति भी उनका पूरा सहयोग करते हैं, जिससे वह दोगुनी ऊर्जा के साथ बच्चों को शिक्षित कर पा रही हैं।

बच्चों को दिखा रहीं सफलता की राह

अमृता के लिए शिक्षण केवल एक नौकरी नहीं, बल्कि नौनिहालों को संस्कार और सही राह दिखाने का एक संकल्प है।

उनके कुशल मार्गदर्शन का ही परिणाम है कि ठाढ़ी गांव के कई छात्र आज सैनिक स्कूलों, नवोदय विद्यालय और अन्य नामचीन संस्थानों में दाखिला पा चुके हैं। वहीं कई युवा पुलिस और सेना में भर्ती होकर देश सेवा में अपना योगदान दे रहे हैं।

स्कूल के बाद घर पर भी मुफ्त शिक्षा

किताबी ज्ञान के साथ-साथ जीवन मूल्यों और संस्कारों का पाठ पढ़ाने वाली अमृता स्कूल के समय के बाद घर पर भी बच्चों को पढ़ाती हैं। उनका मानना है कि मजबूत इच्छाशक्ति के आगे कोई भी शारीरिक बाधा बड़ी नहीं हो सकती।

अपने संघर्ष को ताकत बनाकर वह न केवल खुद आत्मनिर्भर बनी हैं, बल्कि वाल्मीकिनगर इलाके के लोगों के लिए प्रेरणा की मिसाल पेश कर रही हैं।

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