हाजीपुर : हाजीपुर का इलाका वैसे तो केला और फुलगोभी सहित कलमी पौधे के लिए ही प्रसिद्ध है परन्तु अब यह धीरे-धीरे तरबूज की खेती में भी प्रसिद्धी हासिल करता जा रहा है। जी हां! हाजीपुर शहर और इसके आसपास का इलाका विभिन्न प्रजाति के केला, उन्नत किस्म के फुलगोभी और उसके बीज सहित कलमी पौधे और शहद उत्पादन के लिए ही नहीं बल्कि तरबूज उत्पादन के मामले में भी अव्वल है। आप यूं कहें कि यहां के मेहनती किसान पत्थर पर भी गुलाब का पौधा उगाने में सक्षम हैं। बताते चलें कि हाजीपुर कौनहारा घाट से लेकर 15 से 20 किलोमीटर दूर लालगंज अंचल की आखिरी सीमा तक हजारों हेक्टेयर गंडक की रेती में रस यानि तरबूज की खेती हो रही है। हरौली स्थित प्रसिद्ध वृद्धाम्बा बुढि़या माई स्थान चौक तरबूज की बहुत बड़ी मंडी है। यहां से बिहार, पश्चिम बंगाल, उत्तरप्रदेश, झारखंड के अलावे नेपाल के सुदूर इलाकों में तरबूज भेजे जाते हैं। आसपास के इलाके के तरबूज उत्पादक किसानों द्वारा बैलगाड़ी, छोटी ट्रक, ठेला पर तरबूज लादकर हरौली मंडी में पहुंचाया जाता है। दिन के दोपहर से मंडी में रौनक बढ़ जाती है। कई प्रांतों से आने वाले व्यापारी बकायदा इसकी खरीद के लिये बोली तक लगाते हैं। प्रतिदिन 70 से 100 ट्रक माल इधर से उधर जाता है। तरबूज के साथ मीनापुर राई के उपेन्द्र तिवारी, अजय कुमार तिवारी, अनुज चौधरी कुतुपुर डुमरी, बाकरपुर के गोपाल जी तिवारी, अनुज चौधरी कुतुपुर डुमरी, संजीव कुमार, इस्माइलपुर के रंजीत सिंह, श्रीरामपुर के ध्रुव सिंह समेत अन्य तरबूज उत्पादक मंडी में मिलते हैं। कीमत अच्छी मिलने की बात पूछने पर वे कहते हैं कि दस से पन्द्रह रूपये प्रति किलो की दर से ही तो थोक भाव में तरबूज की बिक्री हो रही है। अभी सीजन है। कल को कोई पांच रूपये में भी पूछने वाला नहीं रहेगा। गंडक में पानी आ गया तो सब कुछ चौपट। तरबूज की खेती को कष्ट साध्य व खर्चीला बताते हुए उन किसानों ने कहा कि बीज डालने से लेकर फलों की तुड़ाई तक लगभग सात महीने लगते हैं। तरबूज की खेती विशेष तरीके से की जाती है। किसानों ने बताया कि इसके बीज दिल्ली से मंगाये जाते हैं जिसकी न्यूनतम दर पांच हजार से लेकर 15 हजार रूपये प्रति किलो है। बीजरोपण तैयार गड्ढों में होता है। एक गढ्डा तैयार करने में 70 से 100 रूपये लागत आती है। एक एकड़ में लगभग 200 गढ्डे तैयार किये जाते हैं। एक गढ्डा में बमुश्किल 4 पेड़ उगते हैं जिसमें 10 से 15 फल लगते हैं। कीड़े के प्रकोप से फसल को बचाने के लिए प्रति सप्ताह कीटनाशी रसायनों का छिड़काव करना पड़ता है। कड़ी मेहनत के साथ पूंजी लगाने के बाद भी किसानों को यह गारंटी नहीं कि लागत निकल ही जायेगा। गंगा मैया की कृपा, मौसम का मिजाज और बाजार के रूख पर ही तरबूज उत्पादकों का सब कुछ निर्भर है।

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