विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

सुपौल में पानी के बीच छिपी है मखाने से कमाई की राह, फिर भी सैकड़ों एकड़ जमीन बेकार, आखिर कब जागेगा विभाग

Published: Fri, 23 Oct 2026 08:31 PM (IST)

सुपौल के कोसी क्षेत्र में मखाना की खेती की अपार संभावनाएं हैं, लेकिन प्रशासनिक उपेक्षा के कारण सैकड़ों एकड़ उपजाऊ जमीन बेकार पड़ी है।

एआई द्वारा जेनरेट इमेज।

एआई द्वारा जेनरेट इमेज।

HighLights

  1. कोसी क्षेत्र में मखाना खेती की असीम संभावनाएं मौजूद।

  2. प्रशासनिक उपेक्षा से सैकड़ों एकड़ उपजाऊ जमीन बेकार।

  3. प्रसंस्करण इकाई से स्थानीय रोजगार और आय में वृद्धि।

संवाद सूत्र, सरायगढ़ (सुपौल)। कोसी क्षेत्र में मखाना की खेती की असीम संभावनाएं होने के बावजूद यह उपजाऊ फसल आज भी प्रशासनिक उपेक्षा का शिकार है।

सरायगढ़-भपटियाही प्रखंड के पूर्वी कोसी तटबंध से सटे गाइड बांध और नेशनल हाईवे (NH) के बीच फैले सैकड़ों एकड़ खेतों में वर्षभर पानी भरा रहता है।

इन दलदली और स्थायी जलमग्न जमीनों पर बड़े पैमाने पर मखाना की बंपर खेती की जा सकती है, लेकिन विभागीय स्तर पर कोई ठोस पहल नहीं होने के कारण यह कीमती जमीनें बंजर जैसी स्थिति में पड़ी हैं।

संभावनाएं बड़ी, लेकिन पहल का अभाव

कृषि जानकारों का मानना है कि गाइड बांध और एनएच के बीच का यह इलाका मखाना फसल के लिए सर्वोत्तम है। मखाना को मुख्य रूप से दलदली और स्थायी पानी वाली भूमि की आवश्यकता होती है, जो यहाँ प्राकृतिक रूप से प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है।

इसके बावजूद विभागीय अधिकारियों की उदासीनता और किसानों को सही तकनीकी मार्गदर्शन न मिलने के कारण खेती का विस्तार नहीं हो पा रहा है। वर्तमान में इस पूरे इलाके में मखाना खेती का दायरा घटकर मात्र एक सौ एकड़ के आसपास सिमट कर रह गया है, जबकि सही योजना बनाकर इसे कई गुना बढ़ाया जा सकता है।

बेरोजगारी और पलायन पर लग सकती है लगाम

स्थानीय युवाओं का कहना है कि यदि मखाना खेती को संस्थागत सहयोग और सरकारी प्रोत्साहन मिले, तो यह इस क्षेत्र के लिए रोजगार का सबसे बड़ा साधन बन सकता है।

आज रोजगार की तलाश में यहाँ के बड़ी संख्या में मजदूर पंजाब, हरियाणा और दिल्ली जैसे महानगरों में पलायन करने को विवश हैं। यदि स्थानीय स्तर पर मखाना उत्पादन को बढ़ावा मिले तो हजारों लोगों को यहीं रोजगार मिल सकता है।

स्थानीय किसान महेंद्र यादव बताते हैं कि पहले इस इलाके में 200 से 250 एकड़ में मखाना की खेती होती थी, जो अब घटकर एक तिहाई से भी कम रह गई है।

प्रोसेसिंग यूनिट और पैकेजिंग सेंटर की सख्त दरकार

मखाना को आज 'सुपर फूड' की श्रेणी में रखा जाता है। इसमें मौजूद प्रचुर मात्रा में प्रोटीन, कैल्शियम और एंटीआक्सीडेंट तत्व इसे सेहत के लिए बेहद गुणकारी बनाते हैं।

यही कारण है कि देश के साथ-साथ विदेशों में भी इसकी मांग लगातार आसमान छू रही है। बाजार में कच्चा मखाना 200 से 250 रुपये किलो बिकता है, जबकि इसका लावा 500 से 600 रुपये प्रति किलो तक बिकता है।

दुर्भाग्यवश, कोसी इलाके में अब मखाना से लावा बनाने का काम लगभग ठप हो चुका है। किसान केवल कच्चा माल बेचकर ही संतुष्ट होने को मजबूर हैं।

यदि सरकार या प्रशासन द्वारा यहाँ छोटे-छोटे प्रोसेसिंग यूनिट और पैकेजिंग सेंटर स्थापित करवा दिए जाएं, तो यहाँ के किसानों और युवाओं को कई गुना अधिक मुनाफा मिल सकता है। साथ ही घर बैठी महिलाओं को भी स्वरोजगार के बेहतरीन अवसर प्राप्त हो सकते हैं।

यह भी पढ़ें- सुपौल के सिमरी में दशहरा मेले का अखाड़ा बना रोमांच का केंद्र, देशभर के पहलवानों के दांव-पेच देखने उमड़ी भीड़