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सुपौल। प्रखंड क्षेत्र के आंगनबाड़ी केंद्रों का हाल-बेहाल है। केंद्रों पर सुविधाओं की लंबी फेहरिस्त है, कितु समाज के कुपोषित और कमजोर लोग और कुपोषित होते जा रहे हैं। जिसके कारण इसकी दशा सुधरने के बजाय दिन-प्रतिदिन बिगड़ती ही जा रही है। जमीन के अभाव में अधिकांश आंगनबाड़ी केंद्र भवनहीन हैं। छोटे-छोटे बच्चे दालान में फर्श पर बैठ कर कैसे शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं यह किसी से छिपी नहीं है ।

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निर्धारित संख्या से कम होती उपस्थिति

अधिकांश केंद्रों पर निर्धारित संख्या के बजाय काफी कम छात्रों की उपस्थिति हो रही है। कई आंगनबाड़ी केंद्र तो कभी खुलते ही नहीं कागजी आंकड़े झूठ का पुलिदा के सिवाय और कुछ नहीं है। सब कुछ जानते हुए भी विभागीय अधिकारी अंजान बने हैं। कागजी फाइल दुरुस्त कर की जा रही गड़बड़ी पर पर्दा डाला जा रहा है।

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हर छह महीना में कराना होता है सामाजिक अंकेक्षण

राज्य सरकार के आइसीडीएस निदेशालय के निर्देशानुसार हर छह महीना में सामाजिक अंकेक्षण कराना जरूरी होता है। सामाजिक अंकेक्षण से केंद्र के क्रियाकलाप, केंद्र पर दी जानेवाली सभी छह तरह की सुविधाओं से जुड़ी अन्य मूलभूत जानकारी पोषक क्षेत्र के लाभुकों को दी जानी चाहिए। सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार सभी पंचायतों में सामाजिक अंकेक्षण का कार्य पूरा नहीं हो पाया है।

Posted By: Jagran

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