सुपौल। कोसी की धरती को बड़े उद्योग भले ही आज भी नसीब नहीं हो पाया हो लेकिन लघु व कुटीर उद्योगों का हमेशा से केन्द्र रहा है। इन्हीं छोटे उद्योगों के भरोसे लोगों ने उन्नति भी की है। आज आलम यह है कि संरक्षण का अभाव, सरकारी इमदाद नहीं दिया जाना, आधुनिकता के दौर आदि ने कई घरेलू उद्योगों को अपने आगोश में ले लिया इन्हीं उद्योगों में से एक है लाह चूड़ी का उद्योग। सुपौल के लाह की चूड़ी कभी वाह-वाह होती थी जो आज मात्र आह बनकर रह गई है। महिलाओं के सुहाग व पवित्रता की परिचायक ये लाह चूड़ियां अब धार्मिक आयोजनों पर ही खोजी जाती है, शेष पर फैंसी चूड़ियों का कब्जा है। जबकि इस उद्योग के माध्यम से न सिर्फ घर के पुरुष बल्कि महिलाएं भी चूड़ी बना कर अपना जीवन-यापन करते थे।

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रोजगार की थी समस्या

भारतीय संस्कृति में चूड़ियां ना सिर्फ सौंदर्य प्रसाधन है बल्कि सुहाग का प्रतीक भी है। चूड़ियों का परंपरागत इतिहास के कारण इसका कारोबार भी काफी पुराना है। एक समय था जब यह पुस्तैनी कारोबार के रूप में जाना जाता था। इसे तैयार करने वाले लहेड़ी कहलाते थे। घर में चलनेवाला कारोबार होने के कारण महिलाएं भी चूड़ियां बनाती थी। खासकर त्रिवेणीगंज और जिला मुख्यालय में इसे बनाने वाले कई परिवार की बस्तियां थी जो आज भी है। नहीं है तो सिर्फ वह पुस्तैनी करोबार। यह करोबार सिमटता जा रहा है।

इसके अलावा जिले के प्रतापगंज, राघोपुर इलाके में भी यह उद्योग चलता था। इन जगहों पर तैयार चूड़ी कोसी के विभिन्न जिलों में भेजी जाती थी। इससे लोगों की अच्छी-खासी आमदनी होती थी। शादी-विवाह के मौके पर तो इस इलाके में इसकी ही मांग होती थी।

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कहते हैं धंधे से जुड़े लोग

मंदी के इस दौर में भी अपने पुस्तैनी धंधा को चला रहे त्रिवेणीगंज की रिजवान खातून, रही खातून, मुन्नी खातून, आजमीन खातून, सबीना खातून आदि बताती हैं कि एक समय था जब इनकी लाह की चूड़ियों की इलाके ही नहीं बल्कि बाहर में भी मांग थी। धंधा अच्छा-खासा था लेकिन ज्यों-ज्यों लोगों पर फैशन का जुनून चढ़ने लगा और फैंसी चूड़ियां बाजार में आ गई इस धंधे में ग्रहण लग गया। पहले पुरुष भी इस धंधा में साथ देते थे लेकिन कारोबार मंदा होने के बाद पुरुष बाहर कमाने चले जाते हैं और हमलोग किसी तरह घर में बैठ कर इस धंधे को चला रहे हैं।

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Posted By: Jagran