-बालू बनेगा वरदान, ढ़ूंढ़ा जा रहा निदान

-कोसी के बीचोबीच दौड़ेगी रेल

-कोसी पर बनेगा देश का सबसे लंबा पुल

भरत कुमार झा,सुपौल: कोसी जब सीमाओं में नहीं बंधी थी तब भी और आज जब तटबंध से बांध दी गई है, तब भी उसकी प्रलय लीला जारी है। इसके स्थाई समाधान की दिशा में बातें तो हमेशा से होती रही लेकिन समाधान हो न सका। नए साल में लोगों की उम्मीदें जगी है। एक ओर इसकी सबसे बड़ी समस्या सिल्ट का समाधान ढ़ूंढ़ा जा रहा है। अभियंताओं ने कोसी के बालू से ऐश ब्रिक्स और चीनी मिट्टी से बनने वाले कलाकृतियों की दिशा में शोध शुरु कर दिया है। रिसर्च पूरा होने के बाद कोसी का यह बालू वरदान साबित हो जाएगा। रोजगार के जहां अवसर खुलेंगे, बाजार बढ़ेगा वहीं बालू जो आज सबसे बड़ी समस्या है उसका निदान निकल आएगा। वहीं लगभग 70 वर्षों बाद ध्वस्त पड़ी रेल परियोजना की जो नींव पड़ी थी, रेलपुल बनकर तैयार है, आगे का कार्य भी तीव्र गति से चल रहा है, कोसी वासी उम्मीद पाले हैं कि नए साल में कोसी के बीचोबीच पटरियों पर रेल दौड़ेगी और कोसीवासियों का सपना साकार होगा। सुपौल से भी देश के बड़े शहरों के लिए रेलगाड़ी मिलने की प्रबल संभावना जताई जा रही है। वहीं कोसी में देश के सबसे बड़े सड़क पुल का निर्माण होगा और कोसी के रास्ते और सुगम होंगे।

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हर साल गुजरती है 924.8 लाख घन मीटर सिल्ट

सिचाई आयोग बिहार द्वारा पूर्व में दी गई रिपोर्ट को सच मान लें तो नदी के प्रवाह में 924.8 लाख घन मीटर सिल्ट हर साल गुजरती है। यही गाद कोसी की सबसे बड़ी समस्या है। नदी की पेटी में जमा गाद अगले वर्ष नदी के बहाव में रुकावट पैदा करने लगती है। नदी का पानी इसी गाद को काट कर अपना रास्ता बनाने लगती है और नदी की धारा बदल जाती है। यह सदियों से होता आया है। इसी का नतीजा है कि कोसी पूर्व में हर साल कहीं न कहीं तबाही मचाती रही। अब तटबंध के अंदर मचाती है।

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कोसीकान्हा के उपनाम से मिलेगी मुक्ति

कोसी कटान के लिहाज दुनिया की दूसरी सबसे खतरनाक नदी मानी जाती है। इसलिए जब यह स्वच्छंद विचरण करती थी तो बार-बार धारा बदल देती थी। जो भी इस राह की बाधा बनता उसका नामोनिशान मिटा देती थी। यानी आज जो गांव थे कल कोसी के कारण उसका कोई ठिकाना नहीं रहता था। तटबंध में बंधने के बाद भी लगभग तीन लाख की आबादी इसके अंदर निवास करती है। बारिश के दिनों में जहां ये लोग जल प्रलय झेलते हैं वहीं पानी कम होने पर कटान झेलना लोगों की नियति है। दोनों ही स्थिति में कोसी के लोगों की परेशानी बनी रहती है। इन्हीं परेशानियों को देखते हुए इधर के बाशिंदों को लोग कोसीकान्हा कहकर बुलाते हैं। अगर कोसी कछार पर नए साल में उम्मीदों का सवेरा होता है तो यहां के लोगों को कोसीकान्हा के उपनाम से मुक्ति मिलेगी।

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देश के सबसे बड़े पुल का होगा निर्माण

भारतमाला प्रोजेक्ट के तहत सुपौल के बकौर और मधुबनी के भेजा के बीच देश के सबसे लंबे 10.02 के पुल के निर्माण की प्रक्रिया प्रारंभ कर दी गई है। मधुबनी के उचैठ स्थान से सुपौल के परसरमा के बीच प्रस्तावित एनएच 527 ए का निर्माण पांच चरणों में होना है। इसके तहत प्रथम चरण में पुल का टेंडर कर लिया गया है। 1286 करोड़ की लागत से इस महासेतु का निर्माण होना है। जिसमें पुल की लागत 984 करोड़ होगी। इस पुल में 204 पिलर और 50 मीटर लंबाई वाले 50 स्पैन होगा।

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विशेषज्ञों की नजर में कोसी का समाधान

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समझना होगा नदी का चरित्र : भगवानजी

तटबंध निर्माण के बाद हाई डैम पर खूब चर्चा हुई। विशेषज्ञों की टीम को विभिन्न नदियों की प्रकृति को समझने के लिए चीन सहित अन्य देश भेजा गया। इस संबंध में जल विशेषज्ञ व नदी घाटी पर कार्य कर चुके भगवानजी पाठक बताते हैं कि कोसी नदी को नए नजरिये से देखने की जरूरत है। सरकार हजारों करोड़ रुपये जीर्णोद्धार पर खर्च तो कर ली, मगर कुछ लाख रुपये नदी के चरित्र को समझने के लिए वैज्ञानिक अनुसंधानों पर खर्च करती तो कोसी के चरित्र में भारी परिवर्तन आता। इसके मौजूदा प्रवाह-मार्ग, दोनों तटबंध के अंदर के तल आसपास कंट्री साइड के तल से ऊंचे हो गए हैं। ऐसी परिस्थति में कोसी को तटबंधों के अंदर रखना अब मुमकिन नहीं रह गया है। भले ही तटबंधों को ऊंचा और पक्का कर हम कुछ साल नदी को तटबंधों के अंदर बहा लें, लेकिन स्थायी तौर पर हम ऐसा नहीं कर सकते।

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उपधाराओं को करना होगा पुनर्जीवित : चंद्रशेखर

जल संरक्षण पर लंबे समय से कार्य कर रहे ग्राम्यशील के सचिव व मेघ पानि अभियान के जिला प्रभारी चंद्रशेखर के विचार हैं कि प्रकृति के अपने नियम हैं। उससे मनुष्य को प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से छेड़छाड़ नहीं करना चाहिये। इसे प्रकृति का धरोहर मान जीवन जीना सीखना होगा। नदी को अविरल बहने के लिये छोड़ दिया जाना चाहिये। लेकिन अब तटबंध के बिना आम जनजीवन की तबाही काफी बढ़ जाएगी। नदी का दबाव कम करने के लिए उपधाराओं को पुनर्जीवित करने की जरूरत है ताकि नदी की धारा का प्रवाह इन उपधाराओं में बंट जाए। इसके लिये जगह-जगह स्लुईस गेट आदि का निर्माण किया जाना चाहिये। दूसरी ओर नहर प्रणाली को सुदृढ़ कर कोसी के दबाव को कम किया जा सकता है।

Posted By: Jagran

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