-कोट

-जिले में धान अधिप्राप्ति की शुरुआत को लेकर जल्द ही बैठक कर क्रय समिति को चिन्हित कर अधिप्राप्ति हेतु प्रक्रिया पूरी की जाएगी।

अरविद कुमार पासवान

जिला सहकारिता पदाधिकारी

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जागरण संवाददाता, सुपौल: देश के साथ-साथ कोसी का यह सुपौल जिला भी कृषि प्रधान जिला है। यहां के लोगों की जीविका का मुख्य साधन कृषि है। जाहिर सी बात है कि सरकार से लेकर प्रशासन किसानों की बेहतरी के लिए बड़े-बड़े दावे करने से नहीं चूकते हैं। परंतु इन बड़े-बड़े दावों के बीच जिले के किसानों की स्थिति दिन व दिन सुधरने के बजाय बिगड़ती ही जा रही है। यहां तक कि लोगों का मन किसानी से टूटता जा रहा है। इसके पीछे की सबसे बड़ी वजह है किसानों को उनके उत्पादन का सही मूल्य समय पर नहीं मिल पाता है। जी तोड़ मेहनत व मौसम से लड़ने के बाद जब किसानों के खलिहान अनाज लगता है तो उनके उत्पाद को कोई पूछने वाला नहीं होता है। मजबूरन उन्हें अपने उत्पाद को औने-पौने दाम में बेचने की मजबूरी होती है। अगर हम वर्तमान हालात को देखें तो किसानों का धान तैयार होकर खलिहान में लगा हुआ है। उनके सिर पर रबी की खेती है,उन्हें पैसे की सख्त जरूरत है, इधर सरकार से लेकर प्रशासन है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य पर धान अधिप्राप्ति को लेकर हाथ पर हाथ धरे बैठी है। शायद वह इस आशा में है कि किसान किसी तरह औने पौने दामों पर बिचौलियों के हाथ अपने उत्पादन को बेच दे और जब किसानों के पास धान का भंडारण समाप्त हो जाएगा तो फिर क्रय केंद्र खोलकर किसानों के बजाय बिचौलियों से धान खरीदकर लक्ष्य को पूरा कर लिया जाएगा और फिर वाहवाही लूट ली जाएगी। इस बात का अंदाजा तो इसी से लगाया जा सकता है कि सरकार द्वारा घोषित धान अधिप्राप्ति शुरुआत की तिथि को एक पखवारा बीत चुका है। परंतु धान अधिप्राप्ति की बात तो दूर प्रशासन अभी इसकी पूर्व तैयारी तक भी नहीं कर पाई है। मजबूरन किसान अपने उत्पाद को औने-पौने दामों में बेचने को मजबूर हैं।

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17 दिन बाद भी धान खरीद की प्रक्रिया नहीं हो पाई शुरू

सरकार द्वारा धान अधिप्राप्ति की शुरुआत 15 नवंबर से की जानी थी। इसके लिए सरकार ने धान का समर्थन मूल्य 1815 रुपये प्रति क्विटंल निर्धारित की थी। क्रय केंद्र खोलने की घोषणा को 17 दिन का समय बीत चुका है। परंतु प्रशासनिक स्तर से इस दिशा में अभी तक तैयारी भी नहीं की गई है। इधर किसान के पास रबी फसल की बोआई के लिए उन्हें पैसे की दरकार है। शादी-विवाह का मौसम प्रारंभ है, किसान अपनी बेटी के हाथ पीले करने की प्रक्रिया में जुटे हुए हैं। लेकिन उनके उपज का सही मूल्य उन्हें नहीं मिल पा रहा है। मजबूरन किसानों को खुले बाजार में 12 सौ रुपये प्रति क्विटल धान बेचने की मजबूरी बनी हुई है। किसानों की मानें तो खुले बाजार में जिस भाव से धान को आंका जाता है उससे उनकी लागत भी नहीं निकल पा रही है। ऐसे में किसानों की आमदनी दोगुनी करने के प्रयास पर प्रश्नचिन्ह खड़ा हो रहा है।

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क्रय केंद्र खोलने की बजाय पैक्स चुनाव में मशगूल है प्रशासन

फिलहाल गांव में अजीबोगरीब स्थिति देखने व सुनने को मिल रही है। किसान खेतों में धान कटाई व खलिहान में ऊपर के भंडारण में व्यस्त हैं। वहीं प्रशासन की ओर नजर टिकाए इस आस में है कि जल्द से जल्द क्रय केंद्र खुल जाए ताकि उनके उपज का उन्हें उचित मूल्य मिल सके। मतलब किसानों को अभी पैसे की दरकार है और प्रशासन पैक्स चुनाव को अंजाम देने में जुटा है। इधर पैक्स चुनाव में उतरे दावेदार भी अपनी गोटी लाल करने की फिराक में लगे हैं। ऐसा नहीं कि इस बार पैक्स चुनाव है तो ऐसी स्थिति आ पड़ी है। सरकारी घोषणा के बाद भी हर वर्ष किसानों को ऐसा ही समय देखना पड़ता है। जब वास्तविक किसानों का खलिहान सूना पड़ जाता है तो फिर प्रशासन द्वारा क्रय केंद्र खोला जाता है तथा बिचौलियों के माध्यम से लक्ष्य को पूरा कर लिया जाता है।

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कहते हैं किसान

पिपरा प्रखंड के किसान मनोज मंडल, अशोक मंडल, भूपेंद्र साह, महेश मेहता, परमेश्वरी मंडल आदि कई किसानों का साफ-साफ कहना है कि सरकार द्वारा न्यूनतम समर्थन मूल्य पर धान अधिप्राप्ति की शुरुआत से किसानों की भलाई तो नहीं होती है। परंतु इनसे जुड़े लोगों की भलाई अवश्य हो रही है। भले ही प्रशासन में बैठे लोग जो दावे कर ले जो वाहवाही लूट ले परंतु जमीनी हकीकत यही है कि किसानों के बजाय बिचौलियों के मार्फत धान की अधिप्राप्ति का लक्ष्य पूरा किया जाता है। उन लोगों का यहां तक कहना है कि आज भी यदि क्रय केंद्र खुल जाए तो कोई ना कोई बहाना बनाकर किसानों का धान खरीद नहीं करेंगे। मजबूरी में जब किसान बिचौलियों के हाथ धान को बेच देते हैं तो फिर क्रय एजेंसियों के आपसी सेटिग-गेटिग के तहत इन्हीं बिचौलियों का धान खरीदा जाता है।

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