कम मेहनत, ज्यादा मुनाफा! फिर भी हाशिए पर बिहार में मरुआ की खेती
आधुनिक खेती पर बढ़ते जोर के कारण सुपौल के लौकहा बाजार में पारंपरिक और पौष्टिक मरुआ की फसल विलुप्ति के कगार पर है।

मरुआ की खेती। (जागरण)
HighLights
आधुनिक खेती के कारण मरुआ की फसल विलुप्त हो रही है।
मरुआ आयरन से भरपूर और स्वास्थ्य के लिए अत्यंत लाभकारी है।
कम लागत व अनेक लाभों के बावजूद किसान इससे विमुख हो रहे।
संवाद सूत्र, लौकहा बाजार (सुपौल)। आधुनिक खेती में अधिक उत्पादन देने वाली और हाइब्रिड फसलों पर बढ़ते जोर के कारण कई पारंपरिक एवं पौष्टिक फसलें धीरे-धीरे विलुप्ति के कगार पर पहुंच गई हैं।
इन्हीं में से एक है मरुआ की फसल। तीन दशक पहले तक बड़े पैमाने पर उगाई जाने वाली यह फसल आज किसानों के खेतों से लगभग गायब होती जा रही है।
ग्रामीणों का कहना है कि मरुआ की खेती कम लागत में होती थी और यह प्रतिकूल मौसम को भी आसानी से झेलने वाली फसल मानी जाती थी। इसके बावजूद आज अधिकांश किसान इसकी खेती नहीं कर रहे हैं, जिससे इसका उत्पादन लगातार घट रहा है।
मरुआ में होती है आयरन की प्रचुर मात्रा
डा. रामचंद्र बताते हैं कि मरुआ अत्यंत पौष्टिक अनाज है। इसमें आयरन प्रचुर मात्रा में पाया जाता है, जिससे एनीमिया की समस्या कम होती है।
यह गर्भवती महिलाओं के लिए लाभकारी माना जाता है, वहीं मधुमेह के मरीजों के लिए भी इसे उपयोगी है। बुजुर्गों का कहना है कि मरुआ की रोटी खाने वालों को पेट संबंधी बीमारियां कम होती थीं। आज स्थिति यह है कि मरुआ की रोटी खाना तो दूर, इसका दर्शन भी दुर्लभ हो गया है।
कहते हैं किसान
किसान जयनाथ यादव, लालो यादव, जयनारायण यादव, उपेंद्र मेहता और रवि शर्मा बताते हैं कि मरुआ की रोपाई जेठ और आषाढ़ महीने में की जाती है। धान की तरह पहले इसकी नर्सरी (बिचड़ा) तैयार की जाती है, फिर रोपाई होती है।
फसल सितंबर तक पककर तैयार हो जाती है। जिन स्थानों पर खेती हुई है इसकी कटाई चल रही है। इस फसल में सिंचाई की आवश्यकता बहुत कम होती है और जलजमाव वाले खेत इसके लिए उपयुक्त नहीं माने जाते।
किसानों के अनुसार पहले मरुआ की खेती पारंपरिक रूप से हर वर्ष की जाती थी। इससे अनाज के साथ-साथ मवेशियों के लिए पौष्टिक चारा भी मिलता था, जिसे पशु बड़े चाव से खाते थे।
इसलिए यह खेती किसानों के लिए काफी लाभदायक मानी जाती थी। अब बहुत कम किसान ही इसकी खेती कर रहे हैं>।
जिउतिया में मरुआ की रोटी खाने की है परंपरा
धार्मिक दृष्टि से भी मरुआ का विशेष महत्व है। जिउतिया पर्व पर इसकी रोटी खाने की परंपरा आज भी कई परिवारों में निभाई जाती है।
ग्रामीणों का मानना है कि बदलती जीवनशैली, खान-पान की आदतों और व्यावसायिक खेती की ओर बढ़ते रुझान ने मरुआ जैसी पारंपरिक फसलों को हाशिये पर पहुंचा दिया है।
कम लागत और अनेक स्वास्थ्य लाभ होने के बावजूद किसान इससे विमुख हो रहे हैं, जिससे यह पौष्टिक फसल धीरे-धीरे विलुप्त होती जा रही है।
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