सुपौल के दुर्गा मंदिर में अनोखी परंपरा: बकरे की जगह दी जाती है झींगा की बलि; 1958 से जारी है बंगाली रीति-रिवाज
सुपौल के पिपरा बाजार स्थित दुर्गा मंदिर में 1958 से बंगाली परंपरा और वैष्णव पद्धति से मां दुर्गा की पूजा ...और पढ़ें

सुपौल के दुर्गा मंदिर में अनोखी परंपरा
HighLights
पिपरा दुर्गा मंदिर में बंगाली परंपरा से पूजा होती है।
बकरे की जगह झींगा की बलि की अनोखी प्रथा है।
1958 में बंगाली परिवार ने रखी थी आधारशिला।
संवाद सूत्र, पिपरा (सुपौल)। आस्था, परंपरा और बंगाली संस्कृति का अनूठा संगम पिपरा बाजार स्थित दुर्गा मंदिर में देखने को मिलता है। यहां मां दुर्गा की पूजा वर्षों से बंगाली परंपरा और वैष्णव पद्धति के अनुसार की जाती है। मान्यता है कि सच्चे मन से मां के दरबार में आने वाले भक्तों की मन्नतें पूरी होती हैं। यही वजह है कि दुर्गा पूजा के दौरान यहां श्रद्धालुओं की विशेष भीड़ उमड़ती है।
मंदिर की सबसे खास बात यह है कि यहां छाग (बकरे) की बलि के बजाय झींगा की बलि देने की परंपरा निभाई जाती है। वहीं, सप्तमी के दिन मंदिर का पट खुलने के साथ ही भक्तों को मां दुर्गा के दर्शन का अवसर मिलता है।
1958 में रखी गई थी मंदिर की आधारशिला
स्थानीय लोगों के मुताबिक, पिपरा बाजार स्थित इस दुर्गा मंदिर की स्थापना वर्ष 1958 में हुई थी। बताया जाता है कि व्यापार के सिलसिले में बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले के पुटोपाड़ा से आए एक बंगाली परिवार ने मंदिर की आधारशिला रखी थी। इसी परिवार के वंशज मधुसूदन डे और शारदा प्रसाद ने मंदिर के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
स्थापना के समय मंदिर में पिंड की पूजा की जाती थी। समय के साथ मंदिर का स्वरूप बदलता गया और आज यह पक्के भवन में स्थापित है। हालांकि, मंदिर के स्वरूप में बदलाव के बावजूद यहां पूजा की पारंपरिक बंगाली पद्धति आज भी कायम है।
वैष्णव पद्धति से होती है मां की आराधना
मंदिर की पूजा समिति के पदाधिकारियों और सदस्यों के अनुसार, यहां स्थापना काल से ही बंगाली रीति-रिवाजों के साथ मां दुर्गा की आराधना की जाती है। दुर्गापूजा के दौरान बंगाली महिलाएं पारंपरिक वेशभूषा में मंदिर पहुंचती हैं। वे अपने घरों से प्रसाद लेकर आती हैं और मां के चरणों में अर्पित कर सुख-समृद्धि तथा परिवार की खुशहाली की कामना करती हैं।
मंदिर परिसर में इन दिनों बंगाली संस्कृति और धार्मिक परंपराओं की विशेष छटा देखने को मिलती है। नौ दिनों तक चलने वाली दुर्गापूजा के दौरान यहां कई विशेष धार्मिक अनुष्ठान किए जाते हैं।
बेल के पेड़ के नीचे कलश स्थापित
बंगाली परंपरा के अनुसार, षष्ठी के दिन बेल के पेड़ के नीचे कलश स्थापित किया जाता है। इसके बाद सप्तमी के दिन केले के पेड़ को स्नान कराकर उसे धोती पहनाई जाती है और पारंपरिक तरीके से सजाया जाता है। फिर इस पेड़ को पास के तालाब में स्नान कराया जाता है।
इसके बाद वैदिक मंत्रोच्चार के बीच ढोल-नगाड़ों के साथ केले के पेड़ को मंदिर के गर्भगृह में मां दुर्गा की प्रतिमा के पास स्थापित किया जाता है। इस धार्मिक अनुष्ठान के बाद मां दुर्गा की विधिवत पूजा-अर्चना की जाती है। इन परंपराओं को देखने के लिए श्रद्धालुओं में खास उत्साह रहता है।
मंदिर की धार्मिक परंपराओं को बनाए रखने में पूजा समिति की महत्वपूर्ण भूमिका है। समिति के अध्यक्ष बद्री नारायण गुप्ता, कोषाध्यक्ष शंकर चौधरी तथा रामनाथ प्रसाद गुप्ता, योगेंद्र मंडल, रामचंद्र चौधरी, बसंत गुप्ता, मनोज डे, अरविंद गुप्ता, गोपाल डे समेत अन्य सदस्य पूजा की व्यवस्थाओं और परंपराओं के निर्वहन में सहयोग करते हैं।
