सीतामढ़ी। शहर स्थित एसआरके गोयनका कॉलेज मैदान में हो रहे सात दिवसीय श्रीमद् भागवत कथा ज्ञान यज्ञ के छठे दिन दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान के संस्थापक व संचालक श्रीआशुतोष जी महाराज की शिष्या भागवताचार्य महामनस्वीनि विदुषी सुश्री आस्था भारती ने रुक्मणी-विवाह प्रसंग का उल्लेख किया। साध्वी जी ने इस प्रसंग में बताया कि मुश्किल से मुश्किल घड़ी में भी भक्त घबराता नहीं, धैर्य नहीं छोड़ता। क्योंकि भक्त चिता नहीं, सदा चितन करता है। जो ईश्वर का चितन करता है, भगवान स्वयं उसकी रक्षा करते हैं। भगवान श्री कृष्ण श्रीमछ्वागवत गीता में कहते हैं - अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जना: पर्युपासते। तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्। भक्त मुझे अनन्य भाव से भेजते हैं, उसका योग क्षेम मैं स्वयं करता हूं। अनन्य भाव अर्थात प्रभु से विशुद्ध प्रेम और प्रेम की सबसे पहली शर्त क्या है? इसी संबंध में गोस्वामी जी रामचरितमानस में माध्यम से कहते हैं- जाने बिन न होई परतीती,बिन परतीती होई नहि प्रीति। अर्थात प्रेम की सबसे पहली शर्त है- उस ईश्वर को जानना। अंतर्घट में उस परब्रह्म परमेश्वर का प्रत्यक्ष अनुभव करना। आज हम परमात्मा को केवल मानते हैं, उसे जानते नहीं है। इसलिए न तो हमारा विश्वास उन भक्तों की तरह ²ढ़ हो पाता है और न परमात्मा से प्रगाढ़ है प्रेम हो पाता है। इसलिए यदि हम चाहते हैं कि जिस प्रकार प्रभु ने प्रह्लाद की रक्षा की, उसी प्रकार हमारी भी रक्षा हो तो हमें भी नारद जी के समान तत्वदर्शी ज्ञानी महापुरुष की शरण में जाकर उनकी कृपा से ईश्वर की तत्व स्वरूप का दर्शन करना होगा। वास्तविकता में यह पावन कथा आपको मानने से जानने की यात्रा पर ले जाने आई है। यही यात्रा संपन्न की थी- मीराबाई, संत नामदेव एवं स्वामी विवेकानंद ने। साध्वी ने कन्या भ्रूण हत्या जिनके कारण समाज में नारी की संख्या, समाज में उसका स्थान और भी कम से कम होता जा रहा है, उसकी चर्चा भी की। साध्वी ने मंच के माध्यम से यह संकल्प भी दिलाते हुए कहा कि माता जानकी की जन्मभूमि पर यह शपथ लें कि हम सभी स्वयं के जीवन से भी संकीर्ण मानसिकता को दूर करेंगे और इस विषय पर समाज में भी जागरूकता लाएंगे। इससे पूर्व स्थानीय विधायक सुनील कुमार कुशवाहा, प्रेम शंकर वर्मा, अभिराज झा, रामबाबू कुमार व विनोद कुमार श्रीवास्तव सहित अन्य अतिथियों द्वारा दीप प्रज्वलित कर कार्यक्रम का शुभारंभ किया गया।

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