अनसुनी कहानी: क्रांतिकारी राजेंद्र प्रसाद की कुर्बानी, अंग्रेज अदालत में लेकर आते थे कटा हुआ हाथ
शेखपुरा के क्रांतिकारी स्वतंत्रता सेनानी राजेंद्र प्रसाद भगत सिंह के गरम दल से जुड़े थे और बम विस्फोट में अपना ...और पढ़ें

क्रांतिकारी राजेंद्र प्रसाद की अनसुनी कहानी (AI Generated Image)
HighLights
शेखपुरा के राजेंद्र प्रसाद भगत सिंह के गरम दल से जुड़े थे।
बम विस्फोट में हाथ गंवाया, अंग्रेज अदालत में सबूत दिखाते थे।
संघर्ष जारी रखा, बाद में कम्युनिस्ट आंदोलन से जुड़ गए।
अरुण साथी, शेखपुरा। "ऐ मेरे वतन के लोगों, ज़रा आँख में भर लो पानी, जो शहीद हुए हैं उनकी ज़रा याद करो कुर्बानी..."। स्वतंत्रता दिवस आते ही देशभक्ति के गीत वातावरण में गूंजने लगते हैं। तिरंगा लहराता है और हम आजादी की खुशियां मनाते हैं, लेकिन इस आजादी की कीमत चुकाने वालों की कहानियां धीरे-धीरे हमारी स्मृतियों से ओझल होती जा रही हैं।
ऐसी ही एक मार्मिक कहानी शेखपुरा जिले के बरबीघा प्रखंड के शेरपर गांव के क्रांतिकारी स्वतंत्रता सेनानी राजेंद्र प्रसाद की है, जिनकी कुर्बानी आज भी अंग्रेजी हुकूमत के अत्याचार की कहानी कहती है।
राजेंद्र प्रसाद पढ़ाई के लिए अपने ननिहाल कदमकुआं, पटना गए थे। उनके मामा वकालत के पेशे से जुड़े थे। इसी दौरान उनका संपर्क क्रांतिकारी विचारधारा से हुआ और वे भगत सिंह के गरम दल से जुड़ गए।
देश को अंग्रेजी शासन से मुक्त कराने का संकल्प लेकर उन्होंने क्रांतिकारी गतिविधियों में सक्रिय भूमिका निभानी शुरू कर दी।
उनके पुत्र विजय सिंहा बताते हैं कि उन्होंने बम बनाने का प्रशिक्षण लिया था। एक अंग्रेज अधिकारी को निशाना बनाने की योजना के तहत वे अपने एक साथी के साथ बम लेकर बंकाघाट की ओर निकले। रास्ते में दुर्घटनावश बम विस्फोट हो गया। इसमें उनका साथी शहीद हो गया, जबकि राजेंद्र प्रसाद गंभीर रूप से घायल होकर एक पीपल के पेड़ के पास बेहोश हो गए।
परिजनों के सहयोग से उन्हें अस्पताल पहुंचाया गया। आरोप है कि अंग्रेज अधिकारियों ने अस्पताल में भी उन्हें नहीं छोड़ा। डॉक्टरों के माध्यम से घायल हाथ को काटने का फैसला कराया गया। अंग्रेजों का दावा था कि हाथ बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया था, लेकिन परिवार के अनुसार इसके पीछे अंग्रेजी हुकूमत की साजिश थी।
हाथ कट जाने के बाद भी राजेंद्र प्रसाद का हौसला नहीं टूटा। उनके पुत्र विजय सिन्हा के अनुसार, उन्होंने कहा था कि "हाथ कट गया तो क्या, बम बनाने का ज्ञान तो मेरे साथियों तक पहुंचता रहेगा।" अंग्रेज बाद में उनके कटे हुए हाथ को भी अदालत में प्रमाण के रूप में प्रस्तुत करते थे।
जेल और यातनाओं के बावजूद उनका संघर्ष जारी रहा। बाद के वर्षों में उन्होंने विभिन्न आंदोलनों में सक्रिय भूमिका निभाई और गरीबों तथा मजदूरों के अधिकारों के लिए भी आवाज उठाई।
वे आगे चलकर कम्युनिस्ट आंदोलन से जुड़े और जनसरोकार की लड़ाई को अपना जीवन समर्पित कर दिया। बरबीघा में कम्युनिस्ट पार्टी का कार्यालय आज भी उनके नाम से जुड़ा हुआ है।
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