'बोल भाई बोल, किसका राज…' कहकर बरबीघा में दहशत फैलाता था जमादार राम बदन सिंह
बरबीघा में 1931 में जमादार राम बदन सिंह की हत्या के बाद अंग्रेजी हुकूमत ने स्थानीय लोगों पर भारी दमन ...और पढ़ें

चैतू राम (फाइल फोटो)
HighLights
1931 में बरबीघा में जमादार राम बदन सिंह की हत्या हुई।
अंग्रेजी पुलिस ने सामूहिक जुर्माना लगाकर भारी दमन किया।
स्वतंत्रता संग्राम में बरबीघा के संघर्ष की महत्वपूर्ण घटना।
अरुण साथी, शेखपुरा। आजादी की लड़ाई का इतिहास केवल बड़े आंदोलनों, नेताओं और नारों तक सीमित नहीं है। छोटे कस्बों और गांवों में भी अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ लोगों ने संघर्ष किया और कई बार उन्हें इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ी। बरबीघा में वर्ष 1931 में हुई एक ऐसी ही घटना आज भी स्थानीय लोगों की स्मृतियों में दर्ज है।
अंग्रेजी पुलिस के जमादार राम बदन सिंह की हत्या के बाद बरबीघा में अंग्रेजी पुलिस ने जमकर दमन किया था। बाजार पर सामूहिक जुर्माना लगाया गया और कई लोगों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया।
स्थानीय जानकारों के अनुसार, उस दौर में बरबीघा बाजार में जमादार राम बदन सिंह का काफी दबदबा था। उनके व्यवहार से व्यापारी और आम लोग परेशान रहते थे।
बताया जाता है कि वह बाजार में लोगों को डराते हुए अक्सर कहते थे- ‘बोल भाई बोल, किसका राज?’ इसके जवाब में भयभीत लोग कहते थे- ‘राम बदन सिंह का राज।’ उनके इस कथित आतंक की चर्चा पूरे बाजार में थी।
ठाकुरबारी में बैठक के बाद निकला था विरोध जुलूस
जमादार के कथित अत्याचार और अंग्रेजी शासन के विरोध में आंदोलनकारियों ने तैलिक पंचायत ठाकुरबारी में बैठक की। इसके बाद अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ जुलूस निकाला गया। जुलूस बरबीघा बाजार से होते हुए आगे बढ़ रहा था। जैसे ही जुलूस झंडा चौक के आगे पहुंचा, पुलिस ने उसे रोकने का प्रयास किया।
इसके बाद पुलिस ने लाठीचार्ज कर दिया। लाठीचार्ज में कई आंदोलनकारी घायल हुए। पुलिस की कार्रवाई से माहौल तनावपूर्ण हो गया।
देखते ही देखते भीड़ उग्र हो गई और पुलिस के साथ टकराव शुरू हो गया। इसी दौरान जमादार राम बदन सिंह की हत्या कर दी गई। घटना की खबर फैलते ही पूरे बरबीघा में हड़कंप मच गया।
हत्या के बाद घर छोड़कर भाग गए थे कई पुरुष
जमादार की हत्या के बाद अंग्रेजी पुलिस की कार्रवाई का भय लोगों में इस कदर था कि बरबीघा के बड़ी संख्या में पुरुष घर छोड़कर दूसरे स्थानों पर चले गए थे। कई लोग गांवों और आसपास के इलाकों में छिप गए।
पुलिस ने आरोपितों और संदिग्ध लोगों की तलाश शुरू कर दी। इस मामले में बरबीघा के चैतू राम सहित कई लोगों को गिरफ्तार कर जेल भेजे जाने की बात स्थानीय जानकार बताते हैं।
‘टामी’ जवानों के पहुंचते ही बढ़ गया था दहशत का माहौल
जमादार की हत्या के बाद अंग्रेजी पुलिस के बड़ी संख्या में जवान बरबीघा पहुंचे। स्थानीय लोग अंग्रेजी सैनिकों को उस समय ‘टामी’ कहकर संबोधित करते थे। इन जवानों के पहुंचते ही बाजार और आसपास के इलाकों में भय का माहौल कायम हो गया।
स्थानीय लोगों के अनुसार, पुलिस ने बाजार में जमकर दमन किया। कई दुकानों में लूटपाट और लोगों के साथ मारपीट की गई। जमादार की हत्या का बदला लेने के लिए आम लोगों को भी परेशान किया गया। अंग्रेजी पुलिस के टामी जवानों का नाम सुनते ही लोग सहम जाते थे।
पूरे बाजार पर लगा था सामूहिक जुर्माना
जमादार की हत्या के बाद अंग्रेजी प्रशासन ने बरबीघा बाजार को भी कार्रवाई के दायरे में लिया। स्थानीय जानकारों के अनुसार पूरे बाजार पर सामूहिक जुर्माना लगाया गया था। जिन लोगों ने जुर्माना देने में असमर्थता जताई या उसका विरोध किया, उनके खिलाफ भी कार्रवाई की गई।
बरबीघा की यह घटना बताती है कि स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान छोटे शहरों और कस्बों में भी अंग्रेजी शासन के खिलाफ प्रतिरोध कितना गहरा था।
आंदोलनकारियों पर लाठीचार्ज से शुरू हुआ टकराव जमादार की हत्या तक पहुंचा और उसके बाद अंग्रेजी प्रशासन की दमनात्मक कार्रवाई ने बरबीघा के लोगों को लंबे समय तक भय के साये में रखा।
