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सारण में बाढ़ ने छीना घर-आंगन, मिट्टी के घरौंदों में सपने बुन रहे नौनिहाल

Published: Sat, 10 Oct 2026 12:29 PM (GMT+05:30)

सारण में बाढ़ से विस्थापित हुए बच्चे तटबंध पर मिट्टी के घरौंदे बनाकर अपने खोए हुए घरों की यादों को संजो रहे हैं।

मिट्टी के घर बनाते बच्चे। फोटो जागरण

मिट्टी के घर बनाते बच्चे। फोटो जागरण

HighLights

  1. बाढ़ विस्थापित बच्चे तटबंध पर मिट्टी के घरौंदे बना रहे।

  2. मासूमों के मन में अपने घर लौटने की चाहत।

  3. बाढ़ पीड़ितों को बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष करना पड़ रहा।

अरुण कुमार तिवारी, पानापुर (सारण)। बाढ़ का पानी भले ही लोगों के घर-आंगन की खुशियां बहा ले गया हो, लेकिन मासूम बच्चों के मन से अपने घर की यादें नहीं मिटा सका है।

पानापुर प्रखंड के सरौजा भगवानपुर गांव में सारण तटबंध पर शरण लिए बाढ़ पीड़ित परिवारों के बच्चे मिट्टी से छोटे-छोटे घरौंदे बनाते नजर आ रहे हैं।

उनके नन्हे हाथों से आकार लेते ये घरौंदे महज खेल नहीं, बल्कि उस आशियाने की कल्पना हैं, जहां कभी उनका बचपन हंसी-खुशी बीतता था। बाढ़ ने उनका घर छीन लिया, तो अब तटबंध ही उनके लिए घर, आंगन और खेल का मैदान बन गया है।

चारों ओर विस्थापन की पीड़ा और भविष्य की चिंता के बीच बच्चों की खिलखिलाहट जिंदगी के प्रति उम्मीद जगाती है। कोई मिट्टी इकट्ठा कर घरौंदे की दीवारें खड़ी कर रहा है, तो कोई भाई-बहनों के साथ खेलकर समय बिता रहा है।

इनकी छोटी-सी दुनिया में भले ही खेल की खुशियां हैं, लेकिन मन के किसी कोने में अपने घर लौटने की चाह भी छिपी है।

घर की यादों को मिट्टी में आकार दे रहे मासूम

तटबंध पर मिट्टी के घरौंदे बनाते बच्चों को देखकर सहज ही समझा जा सकता है कि उनका मन अब भी अपने घर-आंगन में अटका है। जिस जगह कभी परिवार के साथ हंसी-खुशी दिन गुजरते थे, वहां लौटने की उम्मीद उनके खेल में भी झलकती है।

बाढ़ ने उनका परिचित संसार उजाड़ दिया, लेकिन वे मिट्टी से अपनी छोटी-सी दुनिया दोबारा रचने में जुटे हैं। उनकी यह कोशिश विपरीत परिस्थितियों में भी बचपन की सहजता और उम्मीद को जीवित रखे हुए है।

पढ़ाई छूटी, बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष

तटबंध पर रह रहे विस्थापित परिवारों के सामने भोजन, स्वच्छ पेयजल, स्वास्थ्य सुविधाओं और सुरक्षित ठिकाने की चिंता बनी हुई है। सीमित जगह में खाना बनाना, बच्चों की देखभाल करना और घरेलू जरूरतें पूरी करना महिलाओं के लिए चुनौती है।

मवेशियों के लिए चारे की व्यवस्था करना भी मुश्किल हो रहा है। वहीं, घर और विद्यालय से दूर रहने के कारण बच्चों की पढ़ाई बाधित है। किताब-कापियों को सुरक्षित रखने और नियमित अध्ययन का माहौल बनाने में भी परेशानी हो रही है।

बाढ़ का पानी उतरने के बाद भी विस्थापित परिवारों की मुश्किलें खत्म नहीं हुई हैं। उजड़े घरों को संभालना, आजीविका दोबारा शुरू करना और बच्चों की पढ़ाई को पटरी पर लाना उनके सामने बड़ी चुनौती है। उन्हें सुरक्षित ठिकाने पर लौटने के लिए आवश्यक सहायता और पुनर्वास की जरूरत है।

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