विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

सत्ता नहीं, व्यवस्था बदलना चाहते थे जयप्रकाश; इंदिरा गांधी के खिलाफ 'संपूर्ण क्रांति' का मूल विचार क्या था?

Published: Sat, 10 Oct 2026 12:54 PM (GMT+05:30)

जयप्रकाश नारायण की संपूर्ण क्रांति का मूल विचार सत्ता बदलने के बजाय व्यवस्था में परिवर्तन लाना था, जिसमें भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और असमानता से मुक्ति शामिल थी।

एआई जनरेटेड फोटो

एआई जनरेटेड फोटो

HighLights

  1. जेपी की संपूर्ण क्रांति का लक्ष्य व्यवस्था परिवर्तन था।

  2. 1974 में बिहार से शुरू हुआ देशव्यापी छात्र आंदोलन।

  3. सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक सहित सात आयामों में बदलाव।

जाकिर अली, छपरा। सत्ता बदलना आसान हो सकता है, लेकिन व्यवस्था बदलने के लिए समाज की सोच, राजनीतिक आचरण और नागरिकों की भागीदारी में बदलाव जरूरी है।

लोकनायक जयप्रकाश नारायण की संपूर्ण क्रांति का मूल विचार यही था। उनका आंदोलन किसी एक सरकार के विरोध तक सीमित नहीं था।

वे भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, असमानता और कुशासन से मुक्ति के साथ ऐसी व्यवस्था चाहते थे, जिसमें जनता केवल मतदाता बनकर न रहे, बल्कि लोकतंत्र के संचालन में भी अपनी भूमिका निभाए।

1974 में बिहार से उठी उनकी आवाज ने देशव्यापी आंदोलन का रूप लिया और भारतीय राजनीति की दिशा बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

छात्र आंदोलन से निकला व्यवस्था परिवर्तन का विचार

1974 में बिहार के छात्र भ्रष्टाचार, महंगाई, बेरोजगारी और शैक्षणिक अव्यवस्था के खिलाफ आंदोलन कर रहे थे। छात्रों ने जेपी से नेतृत्व संभालने का आग्रह किया।

लंबे समय से सक्रिय दलीय राजनीति से दूर रह रहे जेपी ने आंदोलन का नेतृत्व स्वीकार किया, लेकिन शर्त रखी कि संघर्ष अहिंसक रहेगा और उसका उद्देश्य केवल सरकार गिराना नहीं होगा।

पांच जून 1974 को पटना के गांधी मैदान में उन्होंने संपूर्ण क्रांति का आह्वान किया। उनकी आवाज बिहार की सीमाओं से निकलकर देश के दूसरे हिस्सों तक पहुंच गई।

सात आयामों में बदलाव की परिकल्पना

जेपी की संपूर्ण क्रांति का आशय राजनीतिक बदलाव के साथ समाज के विभिन्न क्षेत्रों में परिवर्तन से था। इसमें सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक, बौद्धिक, शैक्षणिक और नैतिक क्रांति की परिकल्पना शामिल थी।

वे मानते थे कि केवल सरकार बदलने से भ्रष्टाचार और असमानता जैसी समस्याएं समाप्त नहीं होंगी। इसके लिए नागरिकों के आचरण, प्रशासन की जवाबदेही, शिक्षा की दिशा और सामाजिक संबंधों में भी सुधार जरूरी है।

वे सत्ता की ताकत के मुकाबले जनशक्ति को महत्वपूर्ण मानते थे। उनके लिए लोकतंत्र का अर्थ केवल चुनाव कराना नहीं, बल्कि आम लोगों को निर्णय प्रक्रिया में भागीदारी देना भी था।

आज भी विचारों के मूल्यांकन की जरूरत

जेपी के आंदोलन ने 1975 में आपातकाल के दौर में लोकतांत्रिक अधिकारों और नागरिक स्वतंत्रता की बहस को प्रमुखता दी। आपातकाल के बाद 1977 के आम चुनाव में केंद्र में पहली गैर-कांग्रेसी सरकार बनी।

हालांकि सत्ता परिवर्तन के बाद भी जेपी का जोर रचनात्मक सामाजिक कार्य, जनभागीदारी और व्यवस्था में जवाबदेही पर बना रहा।

आठ अक्टूबर 1979 को पटना में उनका निधन हो गया, लेकिन संपूर्ण क्रांति का विचार आज भी इस सवाल के साथ जुड़ा है कि लोकतंत्र को अधिक पारदर्शी, उत्तरदायी और जनकेंद्रित कैसे बनाया जाए।

लोकनायक की विरासत को समझने का अर्थ केवल उनके आंदोलन को याद करना नहीं, बल्कि उन मूल समस्याओं और मूल्यों पर विचार करना भी है जिनके लिए उन्होंने आवाज उठाई थी।

सिताबदियारा से अमेरिका तक संघर्षपूर्ण सफर

लोकनायक का जन्म 11 अक्टूबर 1903 को सारण जिले के सिताबदियारा स्थित लाला टोला में हुआ था। उनके पिता हरसू दयाल श्रीवास्तव और मां फूल रानी देवी थीं। 1920 में उनका विवाह स्वतंत्रता सेनानी ब्रजकिशोर प्रसाद की पुत्री प्रभावती देवी से हुआ।

नौ वर्ष की उम्र में पढ़ाई के लिए पटना पहुंचे जेपी ने मैट्रिक के बाद बिहार नेशनल कॉलेज में दाखिला लिया। महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन और मौलाना अबुल कलाम आजाद के विचारों से प्रभावित होकर उन्होंने पढ़ाई छोड़ दी।

आगे की शिक्षा के लिए अमेरिका गए, जहां खेतों में मजदूरी करने, होटल में बर्तन धोने और अन्य कामों से पढ़ाई का खर्च जुटाया। वहां समाजशास्त्र का अध्ययन करते हुए उनका झुकाव मार्क्सवाद की ओर हुआ।

यह भी पढ़ें- जयप्रकाश विश्वविद्यालय में PG Admission की अंतिम तिथि बढ़ी, अब 8 अक्टूबर तक मौका