विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

जिनके दीयों से रोशन होंगे घर, उनके घर में छाया संकट; बारिश ने छीनी कुम्हारों की दीपावली की कमाई

Published: Wed, 04 Nov 2026 04:09 PM (IST)

दीपावली के लिए दीये बनाने वाले कुम्हार परिवार बेमौसम बारिश से जूझ रहे हैं, जिससे उनकी मेहनत और कमाई प्रभावित ...और पढ़ें

500 घरों में घूम रहा चाक, एक हजार लोगों की आजीविका दांव पर

500 घरों में घूम रहा चाक, एक हजार लोगों की आजीविका दांव पर

संजय शर्मा, दिघवारा (सारण)। दीपावली पर घर-आंगन को रोशन करने वाले मिट्टी के दीये बनाने वाले कुम्हार परिवारों की अपनी जिंदगी इस बार मुश्किलों से घिरी है। त्योहार नजदीक है और चाक पर दीये गढ़ने का काम तेजी से चल रहा है, लेकिन बेमौसम बारिश ने उनकी तैयारियों पर पानी फेर दिया है।

कहीं छतों पर दीये सुखाए जा रहे हैं तो कहीं दालानों में मिट्टी के खिलौनों को आकार दिया जा रहा है। मौसम की बेरुखी के बीच कुम्हार परिवार इस उम्मीद में जुटे हैं कि दीपावली पर उनकी मेहनत का उचित दाम मिल सके।

500 घरों में घूम रहा चाक, एक हजार लोगों की आजीविका दांव पर

दिघवारा प्रखंड के नगर और ग्रामीण क्षेत्रों में करीब 500 घरों के एक हजार लोग इस पारंपरिक काम से जुड़े हैं। पिछले एक महीने से परिवार के सदस्य दीये, खिलौने और मिट्टी के दूसरे सामान तैयार करने में जुटे हैं।

जगह की कमी के कारण कई परिवारों को घर की छतों और दालानों का इस्तेमाल करना पड़ रहा है। कहीं इलेक्ट्रानिक चाक से दीये बनाए जा रहे हैं तो कहीं आज भी पारंपरिक चाक पर हुनर की विरासत आगे बढ़ रही है।

बारिश ने बिगाड़ा गणित, तैयार दीये सुखाना बना सबसे बड़ी चुनौती

दिघवारा नगर पंचायत के वार्ड संख्या तीन स्थित सैदपुर गांव के रामजी पंडित, शंभू पंडित, सुनील पंडित, जयकिशुन पंडित, हरिकिशुन पंडित और विजेंद्र पंडित ने बताया कि मौसम में बदलाव और बेमौसम वर्षा के कारण कई बार काम रोकना पड़ता है।

मिट्टी के सामान समय पर नहीं सूख पाते हैं। इससे उन्हें पकाने और बाजार तक पहुंचाने में परेशानी हो रही है। इस बार डेढ़ से दो हजार दीये और अन्य मिट्टी के सामान तैयार करने की योजना थी, लेकिन बारिश ने उत्पादन प्रभावित कर दिया है।

मिट्टी से लेकर भट्ठी तक महंगा हुआ काम, मेहनत के मुकाबले कमाई नहीं

स्थानीय कुम्हार ललन पंडित ने बताया कि मिट्टी के बर्तन बनाना केवल रोजगार नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति और परंपरा से जुड़ा काम है। हालांकि, अब इस काम में लागत लगातार बढ़ रही है।

मिट्टी जुटाने, सामान बनाने, पकाने और बाजार तक पहुंचाने में पहले से अधिक खर्च करना पड़ता है। भट्ठी के लिए ईंधन भी महंगा हो गया है।

इसके बावजूद बाजार में मिलने वाली कीमत मेहनत और लागत के अनुरूप नहीं है। इससे कुम्हार परिवारों के सामने आजीविका का संकट बढ़ रहा है।

किसानों की तरह कुम्हारों के नुकसान की भरपाई की भी उठी मांग

स्थानीय बद्री पंडित ने कहा कि दीपावली कुम्हार परिवारों के लिए साल के सबसे महत्वपूर्ण अवसरों में से एक है। इसी त्योहार से अच्छी कमाई की उम्मीद रहती है, लेकिन इस बार मौसम ने उम्मीदों को झटका दिया है।

उन्होंने सवाल उठाया कि बारिश से किसानों की फसल खराब होने पर मुआवजे की मांग उठती है, लेकिन कुम्हारों के उत्पादन को हुए नुकसान की भरपाई के लिए भी आवाज उठनी चाहिए। सरकार को कुम्हार परिवारों के लिए आर्थिक सहायता और प्रशिक्षण की व्यवस्था करनी चाहिए।

बाजार में मिट्टी के दीये खरीदेंगे तो बचेगा पारंपरिक रोजगार

कुम्हार परिवारों ने लोगों से इस दीपावली पर स्थानीय मिट्टी के दीये, खिलौने और पारंपरिक बर्तन खरीदने की अपील की है। उनका कहना है कि स्थानीय उत्पादों की खरीदारी से न केवल उनकी आमदनी बढ़ेगी, बल्कि पीढ़ियों से चले आ रहे पारंपरिक हुनर को भी संरक्षण मिलेगा। उनके लिए दीपावली सिर्फ रोशनी का त्योहार नहीं, बल्कि पूरे साल की मेहनत से कमाई करने का बड़ा मौका भी है।

देश और दुनिया की ताजा खबरों के लिए Hindi News देखें। Live Cricket Score , IPO Listings, Shiv Chalisa, राशिफल और दुर्गा चालीसा पर अन्य जानकारी पाएं।