बिहार की अनूठी दुर्गा पूजा, समस्तीपुर में सप्तमी-अष्टमी को नहीं नवरात्र के पहले दिन से ही मां के दर्शन
Ghatasthapana muhurat 2026: समस्तीपुर के विद्यापतिनगर स्थित हरपुर बोचहा दुर्गा स्थान में शारदीय नवरात्र के पहले दिन से ही मां ...और पढ़ें

समस्तीपुर जिले के विद्यापतिनगर प्रखंड स्थित हरपुर बोचहा दुर्गा स्थान की परंपरा बिल्कुल अलग और अनूठी है।
HighLights
समस्तीपुर में नवरात्र के पहले दिन से खुलते हैं मां के पट।
हरपुर बोचहा दुर्गा स्थान की 200 साल पुरानी परंपरा।
महामारी से बचाव हेतु शुरू हुई थी यह विशेष पूजा।
संवाद सहयोगी, विद्यापतिनगर (समस्तीपुर)। Navratri 2026 dates: शारदीय नवरात्र में मां दुर्गा के दर्शन के लिए श्रद्धालुओं को आमतौर पर सप्तमी या अष्टमी तक का इंतजार करना पड़ता है।
हालांकि समस्तीपुर जिले के विद्यापतिनगर प्रखंड स्थित हरपुर बोचहा दुर्गा स्थान की परंपरा बिल्कुल अलग और अनूठी है। यहां नवरात्र के पहले दिन ही कलश स्थापना के साथ मां दुर्गा का पट दर्शन के लिए खोल दिया जाता है।
200 साल पुरानी परंपरा
करीब 200 वर्षों से चली आ रही इस विशिष्ट परंपरा के कारण यहां पहले दिन से ही श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ने लगती है।
पूरे मंदिर परिसर में नौ दिनों तक पूजा-अर्चना और आरती के साथ भक्तिमय माहौल बना रहता है। इस दुर्गा स्थान में मां दुर्गा के साथ लगभग 20 अन्य देवी-देवताओं की भी प्रतिमाएं स्थापित कर पूजा की जाती है।
महामारी से बचाव की मन्नत
स्थानीय मान्यताओं के अनुसार इस पूजा की शुरुआत गांव के रघुवंश नारायण सिंह और कुलदीप नारायण सिंह के पूर्वजों ने की थी।
उन्होंने गांव को महामारी से बचाने की कामना के साथ मां दुर्गा की प्रतिमा स्थापित कर आराधना शुरू की थी। समय के साथ पीढ़ियां बदलती गईं, लेकिन पूर्वजों द्वारा शुरू की गई यह धार्मिक विरासत आज भी पूरी निष्ठा से जारी है।
कलश स्थापना संग पट खुलना
शारदीय नवरात्र में कलश स्थापना को शक्ति की आराधना का शुभारंभ माना जाता है। मंदिर के पुजारी रजनीश कुमार तिवारी बताते हैं कि घट स्थापना के तुरंत बाद पट खोलने की परंपरा दशकों पुरानी है। इसके बाद पूरे नौ दिनों तक श्रद्धालु मां भगवती के सुलभ दर्शन और पूजन का पुण्य लाभ प्राप्त करते हैं।
कंधे पर उठाकर विसर्जन
महानवमी के दिन मंदिर में विशेष धार्मिक अनुष्ठान आयोजित किए जाते हैं, जहां मनोकामना पूर्ण होने पर श्रद्धालु बलि अर्पित करते हैं। इस दिन बड़ी संख्या में महिला श्रद्धालु मां का खोइंछा भरने मंदिर पहुंचती हैं।
विजयादशमी को मां की प्रतिमा को ग्रामीण कंधे पर उठाकर गंगा नदी तक ले जाते हैं और विसर्जित करते हैं।
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