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अनुष्ठान सी जिंदगी, गंगा सा प्रवाह, समस्तीपुर में राजा जनक और विद्यापति की तपस्थली पर कल्पवास शुरू

Published: Mon, 26 Oct 2026 06:35 PM (IST)

Kartik Mass Kalpwas Bihar: समस्तीपुर के चमथा घाट पर कार्तिक मास का कल्पवास मेला शुरू हो गया है, जहां श्रद्धालु ...और पढ़ें

चमथा घाट पर लगा कल्पवास मेला। फोटो: जागरण

चमथा घाट पर लगा कल्पवास मेला। फोटो: जागरण 

HighLights

  1. चमथा घाट पर कार्तिक मास का कल्पवास प्रारंभ।

  2. श्रद्धालु एक माह तक गंगा तट पर साधना करते हैं।

  3. उत्तर बिहार, नेपाल से आते हैं संत और भक्तगण।

पद्माकर सिंह लाला, विद्यापतिनगर (समस्तीपुर)। Samastipur Chamtha Ghat Kalpwas Mela: गंगा की लहरों पर भक्ति का प्रवाह...। कतारबद्ध कुटियों में जीवन की साधना और रेत पर जन-मन का संगम।

मंत्रोच्चार से उर्जित, कंपित और सुवासित धरती-अंबर, यहां आकर जीवन संपूर्णता को प्राप्त करता है। यहां हर में हरि और मन में नाम है।

यह दृश्य है चमथा गंगा घाट का, जहां कार्तिक मास के कल्पवास में जीवन अनुष्ठान सा है और गंगा के सदृश्य निर्मल प्रवाह है।

इस एक माह के जीवनोत्सव में संसारिकता और मोह-माया गंगा के तट पर निर्मल होती है। यह हर कर्म में स्नान, ध्यान, जप-तप, पूजा-पाठ और सत्संग है।

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26 अक्टूबर से 24 नवंबर तक आयोजित कल्पवास में उत्तर बिहार के विभिन्न जिलों के साथ नेपाल की तराई से संत और श्रद्धालुओं की शृंखला समाज, साधना, संस्कार, संयम और संस्कृति के प्रवाह को दर्शाती है।

गत 21 अक्टूबर को विजयादशमी पर संतों ने धार्मिक अनुष्ठान के साथ कीर्ति पताका लहराया था, जो अब इस प्राचीन परंपरा का यशगान कर रहा है।

संयम, साधना और भक्ति का जीवन

कल्पवास केवल गंगा स्नान की परंपरा नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि, संयम और आध्यात्मिक साधना का सुअवसर है। यहां श्रद्धालु एक माह तक गंगा तट पर सादगीपूर्ण जीवन व्यतीत करते हैं।

नियमित गंगा स्नान, पूजा-अर्चना, जप-ध्यान, दान-पुण्य और भजन-कीर्तन उनकी दिनचर्या का मुख्य हिस्सा होते हैं।

सुबह की शुरुआत गंगा स्नान और पूजन से होती है, जबकि दिनभर सत्संग, धार्मिक प्रवचन और सामूहिक भजन-कीर्तन से पूरा वातावरण भक्तिमय बना रहता है।

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कल्पवासी इस दौरान खानपान और दिनचर्या में पूर्ण संयम रखते हुए आध्यात्मिक चिंतन पर ध्यान केंद्रित करते हैं।

भागदौड़ भरी जिंदगी से दूर एक माह तक साधना में बिताया गया यह समय उनके लिए आत्ममंथन और मानसिक शांति का बड़ा माध्यम बनता है। इसी गहरी आस्था के चलते हर साल चमथा घाट पर दूर-दराज से श्रद्धालु पहुंचते हैं।

बदलता रहा कल्पवास का स्थल

चमथा क्षेत्र का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व आसपास के इलाकों में ऐतिहासिक रूप से रहा है। स्थानीय मान्यताएं इस क्षेत्र को प्राचीन काल के चार महाजनपदों के संगम से जोड़ते हुए 'चौमथ' (वर्तमान नाम चमथा) की उत्पत्ति बताती हैं। इस क्षेत्र का विस्तार करीब 12 कोस यानी लगभग 30 किलोमीटर तक माना जाता है।

गंगा की धारा में बदलाव और लगातार होने वाले कटाव के कारण कल्पवास का आयोजन स्थल भी समय-समय पर बदलता रहा है।

वर्तमान में विद्यापतिनगर प्रखंड के समीप अवस्थित बिशनपुर पंचायत के गंगा तट पर कल्पवास का भव्य आयोजन किया जा रहा है। कार्तिक मास में यहां कतारबद्ध कुटियां बनाकर श्रद्धालु एक माह तक वास करते हैं।

पताका फहराकर आयोजन का शंखनाद

कल्पवास की तैयारियों के क्रम में चमथा घाट स्थित आयोजन स्थल पर विशेष धार्मिक अनुष्ठान संपन्न हुआ। इसके बाद साधु-संतों ने संयुक्त रूप से धार्मिक पताका फहराई।

इस दौरान विधिवत पूजा-अर्चना कर एक माह तक चलने वाले इस कल्पवास के निर्विघ्न संपन्न होने की कामना की गई।

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इस अवसर पर कल्पवास सेवा समिति के अध्यक्ष श्रीश्री 1008 संत सत्यनारायण दास जी महाराज, महामंडलेश्वर राष्ट्रीय संत श्रीश्री 1008 रामसेवक दास शास्त्री उर्फ ननकी बाबा, संत रामबालक आचार्य, संत शिवचंद्रजी महाराज, संत उद्धव दासजी महाराज और संत किशोरी शरणजी महाराज सहित दर्जनों साधु-संत उपस्थित रहे।

साथ ही पूर्व मुखिया श्रीराम राय, सरपंच प्रतिनिधि श्रवण कुमार राय, राम नरेश राय पहलवान, उपेंद्र राय, मधुसूदन राय, सुरेश राय, उदन कुमार, अशरफी राय, शिवनाथ राय और मुखिया उदय कुमार राय समेत क्षेत्र के सैकड़ों श्रद्धालु मौजूद रहे।

नेपाल की तराई तक जुटान

चमथा घाट के इस ऐतिहासिक कल्पवास में समस्तीपुर, वैशाली, दरभंगा, मधुबनी और बेगूसराय सहित उत्तर बिहार के कई जिलों से भारी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं।

इसके अलावा नेपाल की तराई से भी साधु-संतों और श्रद्धालुओं के यहां आकर कल्पवास करने की पुरानी परंपरा रही है।

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