आधुनिकता के शोर में आज भी जीवंत है 'मृदंग' की थाप, बिहार में पूर्वजों की विरासत सहेज रहे कलाकार
सिमरी बख्तियारपुर में दुर्गा पूजा के दौरान मृदंग बजाने की सदियों पुरानी परंपरा आधुनिकता के बावजूद आज भी जीवंत है। ...और पढ़ें

आधुनिकता के दौर में भी जीवंत है मृदंग बजाने की सदियों पुरानी परंपरा
HighLights
सिमरी बख्तियारपुर में मृदंग बजाने की सदियों पुरानी परंपरा।
दुर्गा पूजा के दौरान कलाकार घर-घर बजाते हैं मृदंग।
कम आमदनी के बावजूद कलाकार सहेज रहे पैतृक विरासत।
संवाद सहयोगी, सिमरी बख्तियारपुर (सहरसा)। आधुनिकता के दौर में जहां पारंपरिक लोककलाएं धीरे-धीरे विलुप्त होती जा रही हैं, वहीं सिमरी बख्तियारपुर में दुर्गा पूजा के अवसर पर 'मृदंग' बजाने की सदियों पुरानी परंपरा आज भी जीवंत है।
शारदीय नवरात्र के दौरान सुबह होते ही नगर परिषद क्षेत्र से लेकर ग्रामीण इलाकों तक मृदंग की थाप गूंजने लगती है।
पारंपरिक वाद्य यंत्र के साथ कलाकार गली-मोहल्लों में घूमकर घरों और दुकानों के दरवाजे पर मृदंग बजाते हैं। इस दौरान मां दुर्गा के जागरण के साथ लोगों के घरों में सुख-समृद्धि और खुशहाली की कामना की जाती है।
नवरात्र के पहले दिन से ही कलाकार सुबह-सुबह अपने मृदंग के साथ निकल पड़ते हैं। नौ दिनों तक चलने वाली इस परंपरा में कलाकार घर-घर और दुकान-दुकान पहुंचकर अपनी कला का प्रदर्शन करते हैं।
मृदंग की गूंज से पूरा वातावरण भक्तिमय हो उठता है। स्थानीय लोगों के लिए मृदंग की थाप दुर्गापूजा के पारंपरिक उल्लास और धार्मिक आस्था का अभिन्न हिस्सा है।
पूर्वजों से मिली विरासत को सहेज रहे कलाकार
मृदंग बजाने वाले कलाकारों के अनुसार, यह परंपरा उनके पूर्वजों के समय से चली आ रही है। उनके पिता और दादा भी नवरात्र के दौरान घर-घर जाकर मृदंग बजाया करते थे। उन्हीं से मिली कला को वे आज भी आगे बढ़ा रहे हैं।
कलाकारों के लिए यह केवल आजीविका का साधन नहीं, बल्कि पूर्वजों की विरासत और धार्मिक आस्था से जुड़ा दायित्व भी है।
सिमरी बख्तियारपुर नगर परिषद के वार्ड संख्या 19 में मृदंग बजाने वाले कलाकारों के कई परिवार रहते हैं। नवरात्र शुरू होते ही इन परिवारों के सदस्य अपने पारंपरिक वाद्य यंत्र के साथ क्षेत्र में निकल पड़ते हैं। नौ दिनों तक लगातार घर-घर जाकर मृदंग बजाना उनकी दिनचर्या का हिस्सा बन जाता है।
मेहनत अधिक, आमदनी बेहद कम
इन्हीं कलाकारों में शामिल नारायण राम भी इस नवरात्र में सुबह से ही घरों और दुकानों पर जाकर मृदंग बजा रहे हैं। उन्होंने बताया कि उनके पूर्वज वर्षों से इस परंपरा का निर्वहन करते आ रहे थे। उन्हीं से उन्होंने मृदंग बजाना सीखा और अब इस विरासत को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का प्रयास कर रहे हैं।
नारायण राम के मुताबिक, नवरात्र के नौ दिनों तक उन्हें विभिन्न गलियों, टोलों और वार्डों में घूम-घूमकर मृदंग बजाना पड़ता है। इसमें काफी मेहनत लगती है, लेकिन इसके बदले मिलने वाली आमदनी बेहद कम है।
नवरात्र के अंतिम दिन लोगों की ओर से जो कुछ मिल जाता है, उसी से संतोष करना पड़ता है। इसके बावजूद वे अपनी पारंपरिक कला को जीवित रखने के लिए लगातार प्रयासरत हैं।
लोक संस्कृति की विशिष्ट पहचान है मृदंग की थाप
नारायण राम के अलावा राम, पृथ्वी राम और ज्योतिष राम सहित अन्य कलाकार भी इस परंपरा को सहेजने में जुटे हैं। सीमित आमदनी और कठिन मेहनत के बावजूद इन कलाकारों का समर्पण क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत को जीवंत बनाए हुए है।
आज जब नई पीढ़ी आधुनिक संगीत और मनोरंजन के साधनों की ओर तेजी से आकर्षित हो रही है, ऐसे समय में सिमरी बख्तियारपुर में मृदंग बजाने की परंपरा लोक संस्कृति की विशिष्ट पहचान बनी हुई है। हालांकि, आर्थिक कठिनाइयों के बीच इस कला को बचाए रखना कलाकारों के लिए चुनौती बनता जा रहा है।
