अंग्रेजों के उड़ाए होश, MLA का टिकट भी ठुकराया; आज अपनी ही माटी में गुमनाम हैं सहरसा के 'जंगली बाबू'
स्वतंत्रता सेनानी जंगली प्रसाद सिंह ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ गांधीवादी विचारधारा से प्रेरित होकर संघर्ष किया और कई बार ...और पढ़ें

टिकट मिलने के बाद भी चुनाव नहीं लड़े थे स्वतंत्रता सेनानी जंगली सिंह (AI Generated Image)
HighLights
गांधीवादी विचारधारा से प्रेरित होकर स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय रहे।
अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ कई बार जेल गए, छिपकर गुजारे दिन।
आजादी के बाद 1952 में विधानसभा चुनाव का टिकट ठुकराया।
संवाद सूत्र, सोनवर्षाराज (सहरसा)। आजादी की लड़ाई में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ संघर्ष करने वाले प्रखंड क्षेत्र के कोपा पंचायत के पचाढ़ी गांव निवासी जंगली प्रसाद सिंह ने स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान कई आंदोलनों में सक्रिय भूमिका निभाई थी। महात्मा गांधी के आंदोलनों में भाग लेने के साथ वे गांधीवादी विचारधारा से भी जुड़े रहे।
आजादी के करीब चार दशक बाद वर्ष 1987 में उनका निधन हो गया। वर्तमान में उनकी कहानी सोनवर्षाराज प्रखंड मुख्यालय स्थित झंडोत्तोलन स्थल पर लगे शिलापट्ट में अंकित नाम तक सिमटकर रह गई है। क्षेत्र की युवा पीढ़ी भी इस स्वतंत्रता सेनानी के संघर्ष और योगदान से अनजान है।
अहिंसा के रास्ते पर चलकर अंग्रेजों से लिया लोहा
स्वतंत्रता सेनानी स्व. जंगली प्रसाद सिंह के पौत्र व पूर्व मुखिया ललन प्रसाद सिंह बताते हैं कि अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ संघर्ष के साथ वे गांधीवादी विचारधारा से प्रभावित थे। आजादी के आंदोलन के शुरुआती दौर में भागलपुर में आंदोलन के दौरान उनके एक साथी ने वंदे मातरम का नारा लगाया था।
अंग्रेजी शासकों ने साथी को गोली मार दी, जिससे उसकी मौत हो गई। साथी की मौत से आक्रोशित जंगली प्रसाद सिंह ने हथियार लेकर अकेले अंग्रेजी पुलिस कैंप जाने का मन बना लिया था।
हालांकि, महात्मा गांधी के अहिंसा के सिद्धांत से प्रेरित होकर उन्होंने अपना निर्णय बदल दिया और अहिंसात्मक आंदोलन में सक्रिय रूप से शामिल हो गए।
अंग्रेजी पुलिस करती रही घर पर छापामारी
आंदोलन में सक्रिय भूमिका और नेतृत्व के कारण जंगली प्रसाद सिंह अंग्रेजी हुकूमत की नजर में आ गए। पुलिस उन्हें गिरफ्तार करने के लिए लगातार उनके घर पर छापामारी करती थी। गिरफ्तारी से बचने के लिए उन्होंने कई माह जमुई जिले के गेगटा मोड़ के जंगल में छिपकर बिताए।
इस दौरान भूख लगने पर पेड़ों के पत्ते खाकर भी समय गुजारना पड़ा। आजाद भारत का सपना लेकर संघर्ष करने वाले जंगली प्रसाद सिंह को कई बार अंग्रेजी हुकूमत ने गिरफ्तार कर जेल की सलाखों के पीछे भेजा।
साथियों की कुर्बानी यादकर भावुक हो जाते थे
आजादी के बाद भी जंगली प्रसाद सिंह स्वतंत्रता आंदोलन में अपने साथियों और देश के लिए बलिदान देने वाले महापुरुषों को हमेशा याद करते थे। स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस के मौके पर झंडोत्तोलन के दौरान वे अपने साथियों की कुर्बानी को याद कर भावुक हो जाते थे।
पौत्र ललन सिंह बताते हैं कि उनके दादा निःस्वार्थ भाव से देश सेवा के लिए समर्पित रहे। आजादी के बाद वर्ष 1952 में कांग्रेस की ओर से उन्हें विधानसभा चुनाव लड़ने के लिए टिकट दिया गया था, लेकिन उन्होंने टिकट लेने से इनकार कर दिया।
