स्वतंत्रता दिवस पर विशेष: सारण की माटी में आजादी की अमर गाथा, हर गांव में दर्ज है संघर्ष और बलिदान
सारण की धरती ने दशकों पहले अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह की आवाज बुलंद की, 1857 से लेकर भारत छोड़ो आंदोलन ...और पढ़ें

अंग्रेजों के खिलाफ शुरुआती विद्रोह से 1942 तक की गाथा (AI Generated Image)
HighLights
1764 में मांझी घाट पर ब्रिटिश सेना का शुरुआती प्रतिरोध हुआ।
1857 के सिपाही विद्रोह में सारण ने कुंवर सिंह का साथ दिया।
1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में सारण का उग्र संघर्ष दिखा।
जागरण संवाददाता, छपरा: स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर जब सारण के शहर से लेकर गांवों तक तिरंगा शान से लहराता है, तब उसकी हर लहर इस धरती के संघर्ष और बलिदान की कहानी सुनाती प्रतीत होती है।
यह वही माटी है, जिसने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ विद्रोह की आवाज देश में स्वतंत्रता आंदोलन के व्यापक रूप लेने से दशकों पहले ही बुलंद कर दी थी। यहां के लोगों ने अलग-अलग कालखंडों में अंग्रेजी सत्ता को चुनौती दी और अंततः स्वतंत्रता की निर्णायक लड़ाई में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
सारण की धरती पर अंग्रेजों के खिलाफ प्रतिरोध की शुरुआत 1857 के सिपाही विद्रोह से काफी पहले हो चुकी थी। 29 जून 1764 को ब्रिटिश सेना की एक टुकड़ी घाघरा नदी पार कर मांझी के रास्ते सारण में दाखिल हुई।
मांझी घाट पर स्थानीय युवाओं ने उसका रास्ता रोककर अंग्रेजी सैनिकों का मुकाबला किया। यह घटना सारण में ब्रिटिश सत्ता के खिलाफ शुरुआती प्रतिरोध का महत्वपूर्ण अध्याय मानी जाती है।
इसके अगले ही वर्ष 1765 में वर्तमान में गोपालगंज के हुस्सेपुर के महाराज फतेह बहादुर शाही ने अंग्रेजों के खिलाफ खुला विद्रोह कर दिया। उन्होंने अपने इलाके में अंग्रेजों की कर वसूली बंद करा दी। इसके बाद ब्रिटिश शासन और फतेह बहादुर शाही के बीच लंबे समय तक संघर्ष चलता रहा, जो 1795 तक जारी रहा।
इसी दौर में अंग्रेजों की आर्थिक नीतियों के खिलाफ 1771 में नोनिया विद्रोह भी हुआ। शोरा कारोबार पर अंग्रेजों के नियंत्रण और जबरन कम कीमत पर खरीदारी के विरोध में लोगों ने छपरा स्थित शोरा गोदाम को निशाना बनाया। यह प्रतिरोध लंबे समय तक चलता रहा।
1857 के सिपाही विद्रोह के दौरान सारण के लोगों ने बाबू कुंवर सिंह का मजबूती से साथ दिया। क्षेत्र के अनेक लोग उनकी सेना में शामिल हुए।
मलखाचक गांव के रामगोविंद सिंह ''चचवा'' को कुंवर सिंह की सेना का प्रमुख सेनापति बताया जाता है। इस दौर ने सारण के लोगों में अंग्रेजी शासन के खिलाफ संघर्ष की भावना को और मजबूत किया।
राष्ट्रीय आंदोलन के अगले चरण में भी सारण की भूमिका महत्वपूर्ण रही। 26 दिसंबर 1916 को लखनऊ कांग्रेस अधिवेशन में सारण के ब्रजकिशोर प्रसाद, किसान राजकुमार शुक्ल के साथ पहुंचे। अगले दिन दोनों ने महात्मा गांधी से चंपारण चलने का आग्रह किया।
इसके परिणामस्वरूप गांधीजी 1917 में चंपारण पहुंचे। वहां के सत्याग्रह में सारण के ब्रजकिशोर प्रसाद, मौलाना मजहरूल हक और डॉ. राजेंद्र प्रसाद जैसे नेताओं ने गांधीजी का सहयोग किया।
1920 के असहयोग आंदोलन का प्रभाव भी सारण के गांव-गांव तक पहुंचा। लोगों ने सरकारी पद और नौकरी छोड़कर अंग्रेजी शासन से असहयोग का रास्ता अपनाया।
1930 के नमक सत्याग्रह में लोगों ने नमक बनाकर ब्रिटिश कानून को चुनौती दी। विदेशी कपड़ों के बहिष्कार और शराब-ताड़ी की दुकानों पर पिकेटिंग के माध्यम से भी आंदोलन को धार दी गई।
1942 में सारण ने दिखाया संघर्ष का सबसे उग्र रूप
भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान सारण में अंग्रेजी शासन के खिलाफ आंदोलन ने उग्र रूप ले लिया। स्थिति इतनी गंभीर हो गई कि 17 अगस्त 1942 को जिले में मिलिट्री शासन लागू करना पड़ा। 18 अगस्त को मढ़ौरा के महथा गाछी में आंदोलन का सबसे चर्चित घटनाक्रम हुआ।
अमनौर की बहुरिया रामस्वरूपा देवी की ललकार पर निहत्थे ग्रामीणों ने अंग्रेजी फौज के छह सशस्त्र जवानों को मार गिराया। इस घटना की गूंज ब्रिटेन की संसद तक पहुंची।
तत्कालीन सरकारी दस्तावेजों के अनुसार, अगस्त क्रांति के दौरान सारण के 27 थानों पर क्रांतिकारियों ने हमला किया और आठ थानों पर कब्जा कर लिया। अंग्रेजी पुलिस और सेना की कार्रवाई में करीब 31 आंदोलनकारियों को जान गंवानी पड़ी।
816 क्रांतिकारियों को सश्रम कारावास की सजा दी गई, जबकि 109 को कोड़े मारने की सजा सुनाई गई। 40 आंदोलनकारी नेताओं को नजरबंद भी किया गया।
आज जब स्वतंत्रता दिवस पर सारण के हर हिस्से में तिरंगा फहराया जाता है, तब उसके पीछे छिपे इन संघर्षों को याद करना जरूरी है। इसी मिट्टी के किसानों ने अंग्रेजों को कर देने से इनकार किया, युवाओं ने जेल और यातनाएं सहीं और अनेक लोगों ने मातृभूमि के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए।
सारण की आजादी की गाथा केवल इतिहास की किताबों का हिस्सा नहीं, बल्कि यहां की मिट्टी में रचा-बसा स्वाभिमान है। तिरंगे की हर फड़फड़ाहट मानो उन्हीं बलिदानियों की अधूरी नहीं, बल्कि स्वतंत्र भारत में पूरी हुई उस पुकार की याद दिलाती है, जिसने सदियों पहले गुलामी के खिलाफ आवाज उठाई थी।
