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गुल्ली-डंडा, चोर-सिपाही से अंजान होती नई पीढ़ी, बदलते समय में फीके पड़े पारंपरिक खेल; मोबाइल में सिमटता बचपन

Published: Tue, 17 Mar 2026 02:03 PM (IST)

दावथ, रोहतास में बच्चों के पारंपरिक खेल जैसे गुल्ली-डंडा और चोर-सिपाही अब मोबाइल गेम्स के कारण विलुप्त हो रहे हैं। ...और पढ़ें

बदलते समय में फीके पड़े पारंपरिक खेल

बदलते समय में फीके पड़े पारंपरिक खेल

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समय कम है?

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संक्षेप में पढ़ें

संवाद सूत्र, दावथ(रोहतास)। आधुनिकता और तकनीक की तेज रफ्तार ने ग्रामीण जीवनशैली को भी बदल दिया है। कभी गांव की गलियों और खेत-खलिहानों में गूंजने वाली बच्चों की किलकारियां अब कम होती जा रही हैं। पारंपरिक खेल धीरे-धीरे विलुप्ति की कगार पर पहुंच रहे हैं।

मोबाइल गेम्स ने बदली बच्चों की रुचि

पहले बच्चे गुल्ली-डंडा, खो-खो, कबड्डी, छुपा-छुपी, चोर-सिपाही और दोला-पाती जैसे खेलों में घंटों बिताते थे। अब उनकी जगह मोबाइल और ऑनलाइन गेम्स ने ले ली है, जिससे बच्चों का रुझान डिजिटल दुनिया की ओर तेजी से बढ़ा है।

शारीरिक और सामाजिक विकास पर असर

इन पारंपरिक खेलों से बच्चों का शारीरिक विकास तो होता ही था, साथ ही टीमवर्क, अनुशासन और भाईचारे की भावना भी विकसित होती थी। लेकिन अब मोबाइल गेम्स के कारण बच्चों की सक्रियता घटती जा रही है।

बुजुर्गों ने जताई चिंता

गांव के बुजुर्ग कृष्ण बिहारी सिंह, रामजी सिंह और पूर्व प्रधानाध्यापक श्रीनिवास पाठक बताते हैं कि उनके समय में बच्चों का मनोरंजन और फिटनेस का मुख्य साधन यही खेल थे। स्कूल से लौटने के बाद बच्चे मैदान में खेलना नहीं भूलते थे।

नई पीढ़ी हो रही अनजान

आज के बच्चे गुल्ली-डंडा या चोर-सिपाही जैसे खेलों के नाम तक नहीं जानते। ग्रामीणों का कहना है कि यह बदलाव चिंताजनक है, क्योंकि इससे बच्चों का बचपन और संस्कृति दोनों प्रभावित हो रहे हैं।

स्कूलों से भी खत्म होती परंपरा

पहले विद्यालयों में भी बच्चों को इन खेलों के लिए प्रोत्साहित किया जाता था, लेकिन अब यह परंपरा लगभग समाप्त हो गई है। मैदान खाली रहने लगे हैं और बच्चे स्क्रीन तक सीमित होते जा रहे हैं।

विशेषज्ञों ने दिए सुझाव

ग्रामीण बुद्धिजीवियों का मानना है कि यदि समय रहते इन खेलों को बढ़ावा नहीं दिया गया, तो आने वाली पीढ़ियां केवल इनके नाम ही सुन पाएंगी। इसके लिए स्कूलों और समाज को मिलकर पहल करनी होगी।

बचपन लौटाने की जरूरत

जरूरत है कि बच्चों को फिर से मैदानों की ओर आकर्षित किया जाए। पारंपरिक खेलों को पुनर्जीवित कर ही बच्चों के बचपन को स्वस्थ, सक्रिय और खुशहाल बनाया जा सकता है।

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