रोहतास। 'कदम चूम लेती है खुद आ के मंजिल, मुसाफिर अगर तूने हिम्मत न हारी' इस पंक्ति को कैमूर पहाड़ी पर बसे नागाटोली के बच्चे चरितार्थ करते नजर आ रहे हैं। डेढ़ हजार फीट की ऊंचाई पर बसे इस गांव के छात्र-छात्राएं पांचवीं कक्षा के बाद ही प्रतिदिन उंची चोटी से उतर कर मध्य विद्यालय व उच्च विद्यालय बौलिया में पढ़ने आते हैं। जीवन में कुछ बनने की ललक पाले छोटे-छोटे बच्चे उत्साह के साथ उछलते कूदते इस दुर्गम पहाड़ी रास्ते तय करते हैं। विकास की दौड़ में आज भी हासिए पर खड़े वनवासियों को शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क जैसी मूलभूत सुविधाओं की कमी का दर्द साल रहा है।

रोहतासगढ़ किला परिसर में बसे इस गांव के अलावे आसपास के गांवों के बच्चों की पढ़ाई के लिए एकमात्र साधन आदिवासी आवासीय प्राथमिक विद्यालय नागाटोली ही है। जहां सिर्फ पांचवीं कक्षा तक की पढ़ाई होती है। पांचवीं तक की शिक्षा ग्रहण करने के बाद यहां के गरीब आदिवासी बच्चों के पास एकमात्र विकल्प यही बचता है कि वे या तो पढ़ाई छोड़कर मां बाप के साथ उनके कार्यों में हाथ बटाएं या फिर इस ऊंची चोटी से नियमित नीचे उत्तर कर बौलिया विद्यालय में पढ़ाई करने जाएं। रामजी खरवार, बच्चू उरांव, भोला उरांव आदि कहते हैं कि अब वनवासी भी शिक्षा का महत्व समझने लगे हैं। इसलिए कई अभिभावक एवं बच्चों ने कठिन डगर होने के बावजूद दूसरे रास्ते को ही चुना है। आज इन गांवों से बच्चे पढ़ने आते हैं और हंसते खेलते पहाड़ चढ़ जाते हैं। नागाटोली से पहाड़ उतर कर विद्यालय जा रही नवीं कक्षा की राजंती कुमारी, देवंती कुमारी, ¨रकू कुमारी, सलन्ती कुमारी तथा वर्ग छह के राकेश कुमार, महेश कुमार, राजेश कुमार आदि प्रतिदिन विद्यालय आने में हो रही कठिनाई के बारे में जब पूछा गया तो उन बच्चों का मासूमियत भरा जबाब था कि आखिर हमारे पास विकल्प क्या है। हमारी सुनता कौन है। हमारे गांव में भी सड़क, पानी, बिजली, स्कूल होना चाहिए, परंतु कहां यह सब हो रहा है। लेकिन हम हारने वाले नहीं हैं। अपनी पढ़ाई पूरी कर हम खुद अपनी शिक्षा के दम पर अधिकार लेकर रहेंगे। हमारी पढाई में पहाड़ी की ऊंचाई रोड़ा नही बनेगी। आवासीय विद्यालय का भी हाल खस्ता है। यहां भी मीनू के अनुसार भोजन एवं सुविधाएं मयस्सर नहीं है। हालांकि कुछ बच्चे जिनके अभिभावक सक्षम है, उन्हें बौलिया में डेरा लेकर भी पढ़ाते हैं।