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जहां गूंजते थे सायरन और बजते थे बैंड-बाजे, आज वहां सन्नाटा; विश्वकर्मा पूजा पर याद आया डालमियानगर का वैभव

Published: Wed, 16 Sep 2026 07:07 PM (IST)

डालमियानगर और अमझोर में कभी भव्यता से मनाई जाने वाली विश्वकर्मा पूजा अब कारखानों के बंद होने से अपनी रौनक खो चुकी है।

विश्वकर्मा पूजा पर याद आया डालमियानगर का वैभव

विश्वकर्मा पूजा पर याद आया डालमियानगर का वैभव

HighLights

  1. डालमियानगर में विश्वकर्मा पूजा कभी भव्य औद्योगिक उत्सव थी।

  2. कारखाने बंद होने से रौनक और चहल-पहल पूरी तरह गायब।

  3. जंग खाती मशीनें बीते औद्योगिक वैभव की गवाही देती हैं।

प्रेम पाठक, डेहरी आनसोन (रोहतास)। सोन नदी के तट पर बसी देश की कभी प्रमुख औद्योगिक नगरी रही डालमियानगर व अमझोर स्थित पाइराइट्स, फास्फेट्स एंड केमिकल्स लिमिटेड का प्रांगण जब गुलजार हुआ करता था, तब विश्वकर्मा पूजा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि पूरे शाहाबाद क्षेत्र का सबसे बड़ा औद्योगिक उत्सव हुआ करता था। 

मशीनों के देवता भगवान देवशिल्पी की पूजा इन दोनों परिसरों की मुख्य पहचान थी। हालांकि, कारखानों पर ताले लटकने के बाद वह ऐतिहासिक भव्यता अब बीते दिनों की धुंधली यादों में सिमट कर रह गई है।

जब रोशनी से नहा उठती थीं औद्योगिक इकाइयां

रोहतास इंडस्ट्रीज डालमियानगर के स्वर्णिम काल में सीमेंट, पेपर, शुगर, कागज रोलिंग मिल, केमिकल व सेंट्रल वर्कशाप जैसी दर्जनों इकाइयों में हफ्तों पहले से तैयारियां शुरू हो जाती थीं। 17 सितंबर की सुबह होते ही कारखानों के सायरन गूंज उठते थे। वर्कशॉप में भव्य पूजा पंडाल सजते थे, जहां भारी-भरकम मशीनों की सफाई कर उन्हें गेंदे के फूलों व रंग-बिरंगी लाइटों से सजाया जाता था। 

हजारों मजदूरों और अधिकारियों के बीच मिठाइयों का वितरण, पीतल के बैंड-बाजे और सांस्कृतिक कार्यक्रम इस उत्सव की रौनक बढ़ाते थे। ठीक यही मंजर अमझोर स्थित पीपीसीएल और जपला के बौलिया स्थित माइंस का भी रहता था।

जंग खाती मशीनें और पसरी वीरानी 

कंपनियों के बंद होने के साथ ही यह रौनक पूरी तरह गायब हो गई। आज डालमियानगर व पीपीसीएल के जंग खाते शेड, झाड़ियों से ढकी इमारतें और शांत पड़ी मशीनें बीते वैभव की गवाही दे रही हैं। जहां कभी हजारों परिवारों की चहल-पहल और यंत्रों की आवाजें गूंजती थीं, वहां आज सिहरन पैदा करने वाला सन्नाटा पसरा रहता है।

महज रस्म अदायगी तक सिमटा आयोजन

अब पूर्व मजदूर, सेवानिवृत्त कर्मचारी या सुरक्षा अमला महज परंपरा जीवित रखने के लिए बंद परिसरों के मुख्य द्वार या स्थानीय मंदिरों में प्रतिमा स्थापित कर दीपक जला लेते हैं। पुराने कारीगरों की आंखों में बीते दिनों के उल्लास को याद कर आज भी नमी तैर जाती है। कभी रोजगार व औद्योगिक क्रांति की प्रतीक रही यह शिल्पनगरी आज भी अपने पुनरुद्धार की बाट जोह रही है।

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