पूर्णिया का मखाना : बिहार के सीमांचल-मिथिलांचल की आर्थिक ताकत, अब देश-विदेश में कमाई का नया रास्ता
पूर्णिया का मखाना, विशेषकर 'सबौर वन' प्रभेद, सीमांचल और मिथिलांचल की आर्थिक रीढ़ बन गया है। इस उन्नत किस्म ने ...और पढ़ें
HighLights
सबौर वन मखाना ने उत्पादन डेढ़ गुना बढ़ाया, किसानों की आय बढ़ी।
पूर्णिया मखाना को जीआई टैग मिला, अंतरराष्ट्रीय निर्यात में वृद्धि।
मखाना अब 10 राज्यों में फैलकर किसानों को आर्थिक लाभ दे रहा।
जागरण संवाददाता, पूर्णिया। कभी मिथिला की सांस्कृतिक पहचान के साथ जुड़ा मखाना अब सीमांचल और मिथिलांचल के लिए बड़ा आर्थिक संबल बन चुका है। भोला पासवान शास्त्री कृषि कालेज की खोज, सबौर वन मखाना प्रभेद, इस क्रांति का आधार है। पारंपरिक मखाना प्रभेद की तुलना में यह लगभग डेढ़ गुना ज्यादा उत्पादन देता है और इसकी गुणवत्ता भी बेहतर है। इस कारण इसकी मांग अब विदेशों तक बढ़ चुकी है। यही नहीं, अति लाभकारी हो चुकी इस खेती की ओर अन्य राज्यों के किसान भी लगातार आकर्षित हो रहे हैं।
10 सालों में तीन गुना बढ़ा रकवा
पूर्णिया में भोला पासवान शास्त्री कृषि कॉलेज की स्थापना के बाद मखाना के विकास में कई महत्वपूर्ण कदम उठाए गए। 2016 में सबौर मखाना-वन बीज का ईजाद हुआ, जो पारंपरिक मखाना प्रभेद की तुलना में डेढ़ गुना अधिक उपज देता है। उसी वर्ष राज्य बीज निगम ने इसे मान्यता दी और 2019 में भारत सरकार द्वारा इसे गजट में शामिल किया गया।
मखाना अब सीमांचल-मिथिलांचल से निकलकर राज्य के अन्य जिलों और दूसरे राज्यों तक फैल चुका है। बिहार में पूर्णिया, कटिहार, अररिया, किशनगंज, सुपौल, सहरसा, मधेपुरा, दरभंगा, मधुबनी के साथ समस्तीपुर, खगड़िया, भागलपुर, पूर्वी और पश्चिमी चंपारण, मुजफ्फरपुर में इसकी खेती की जा रही है।
2015 से 2025 के बीच बिहार में मखाना का रकवा 13,296 हेक्टेयर से बढ़कर 40,400 हेक्टेयर हो गया। इसमें सबौर मखाना-वन लगभग 41% क्षेत्रफल में उगाई जा रही है। प्रति हेक्टेयर उत्पादकता में लगभग 12 क्विंटल की वृद्धि हुई है, जिससे किसानों की अतिरिक्त आय 3.25 से 3.75 लाख रुपये प्रति हेक्टेयर तक पहुंच गई है।
दूसरे राज्यों में भी फैल रहा मखाना
अब मखाना की खेती केवल बिहार तक सीमित नहीं रही। देश के अन्य राज्यों में भी पूर्णिया का मखाना किसानों की आय बढ़ाने में सहायक बन रहा है। कृषि कालेज के मखाना वैज्ञानिक डॉ. अनिल कुमार के अनुसार, सबौर मखाना-वन बीज देश के 10 राज्यों में उपलब्ध कराया गया है। उत्तर प्रदेश, झारखंड, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, उत्तराखंड, ओडिशा, असम, जम्मू-कश्मीर, मणिपुर और महाराष्ट्र में इसकी खेती की जा रही है।
इन राज्यों में लगभग 50–60 हेक्टेयर में मखाना की खेती शुरू हुई है। एक क्विंटल बीज से 3.5–4 हेक्टेयर तक मखाना उगाया जा सकता है। पहले देश का 90% मखाना सीमांचल-मिथिलांचल में होता था, लेकिन अब अन्य राज्यों में भी इसका उत्पादन बढ़ रहा है।
पूर्णिया बन गया मखाना का व्यापारिक केंद्र
उच्च गुणवत्ता के कारण पूर्णिया का मखाना अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी लोकप्रिय हो गया है। कृषि कालेज की वैज्ञानिक टीम के प्रयास से इसे मिथिला मखाना के नाम से जीआई टैग मिला, जिससे देश और विदेश में अलग पहचान बनी।
एचएसएन कोड मिलने के बाद अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और यूएई जैसे देशों में निर्यात बढ़ा। हाल ही में अमेरिका में नई टैरिफ नीति के कारण निर्यात थोड़ा प्रभावित हुआ है, लेकिन अब अधिक माल यूएई भेजा जा रहा है।
पूर्णिया का हरदा बाज़ार मखाना की प्रमुख मंडी है। यहां 100 से अधिक मखाना फैक्ट्रियां काम कर रही हैं। हरदा मंडी से देश भर में मखाना की दरें तय होती हैं और बड़े पैमाने पर निर्यात भी होता है। प्रतिवर्ष लगभग 3,500 मीट्रिक टन मखाना का व्यापार होता है, जो बिहार के कुल उत्पादन का 20% है। मखाना की कीमत गुणवत्ता के आधार पर 1,200–1,400 रुपये प्रति किलोग्राम रहती है। अनुमानित व्यापार लगभग 250–300 करोड़ रुपये प्रति वर्ष है।
पोषक तत्वों से भरपूर मखाना
मखाना पोषक तत्वों का पावरहाउस है, इसलिए इसे सुपरफूड कहा जाता है। जीएमसीएच के चिकित्सक बागेश्वर प्रसाद के अनुसार, मखाना में प्रोटीन, फाइबर, मैग्नीशियम, पोटैशियम और आयरन प्रचुर मात्रा में होते हैं।
यह कम कैलोरी और वसा वाला होता है, जिससे वजन नियंत्रित रहता है और हृदय स्वास्थ्य बेहतर होता है। इसमें एंटीऑक्सीडेंट्स, कैल्शियम और फास्फोरस भी पर्याप्त मात्रा में होते हैं। मखाना उच्च रक्तचाप और किडनी स्वास्थ्य के लिए भी लाभकारी है। इसमें गैलिक एसिड और क्लोरोजेनिक एसिड जैसे एंटीऑक्सीडेंट पाए जाते हैं, जो सूजन कम करने और एंटी-एजिंग में सहायक हैं।
मखाना अब केवल पारंपरिक व्यंजन नहीं रहा, बल्कि आर्थिक और स्वास्थ्य दोनों दृष्टि से सीमांचल-मिथिलांचल का नया सहारा बन चुका है।
