पटना [अरविंद शर्मा]। गांधी को महात्मा बनाने वाले पश्चिम चंपारण संसदीय क्षेत्र को भाजपा का गढ़ माना जाता है। परिसीमन के बाद दो बार यहां से डॉ. संजय जायसवाल भाजपा और पिता की विरासत संभाल रहे हैं। उनके पिता मदन जायसवाल भी पुरानी बेतिया सीट से तीन बार लगातार सांसद चुने गए थे, किंतु सच्‍चाई यह भी है कि इस क्षेत्र ने किसी की ज्यादा परवाह नहीं की।

1962 से अबतक यहां कई पार्टियों का झंडा बुलंद होते रहे हैं। पिछले चुनाव में देशभर की नजरें इस सीट पर थी, क्योंकि मशहूर फिल्मकार प्रकाश झा यहां से जदयू प्रत्याशी थे। लेकिन, यहां की जनता ने सितारों की राजनीति नहीं की। राजनीति पर कई बेहतरीन फिल्में देने वाले प्रकाश ने सियासत में दखल बनाने की कोशिश जरूर की, किंतु पार्टी बदलने के बावजूद उनकी किस्मत नहीं बदली। मोदी लहर ने उन्‍हें तीसरी बार भी निराश किया।

जीतने से ज्‍यादा हारने वाले की चर्चा

2014 में जीतने वाले से ज्यादा चर्चा हारने वाले की हुई। इसकी वजह थी कि जदयू ने जब प्रकाश को प्रत्याशी बनाया था तो माना जा रहा था कि सियासत पर लगातार कई फिल्में बनाने वाले इस धुरंधर के लिए जीत मुश्किल नहीं होगी।

किंतु परिणाम आया तो धारणा बदल गई। फिल्म और वास्तविक राजनीति की पटकथा में फर्क स्पष्ट हो गया। प्रकाश को स्थानीय होने का भी लाभ नहीं मिला। उन्होंने 2004 में निर्दलीय एवं 2009 में लोजपा के टिकट पर भी किस्मत आजमाई है। हारने के बाद प्रकाश ने जनता की सुध नहीं ली तो मौका आने पर जनता ने भी बदला लिया। दोनों ओर से यह सिलसिला जारी है।

जदयू में प्रकाश की फिर चर्चा है, लेकिन भाजपा-जदयू गठबंधन का पेंच आड़े आ गया है। सीट किसके खाते में जाएगी इस पर निर्भर करेगा। जदयू से डॉ. एमएन शाही भी बड़े दावेदार हैं। चनपटिया विधानसभा क्षेत्र से महज कुछ वोटों से हार चुके हैं।

वर्तमान सांसद डॉ. संजय को राजनीति विरासत में मिली है। 2009 में पिता मदन जायसवाल के निधन के बाद संजय को मौका दिया गया, जो नौ वर्षों से लगातार सांसद हैं।

महागठबंधन में अगर राजद के हिस्से में सीट आई तो राजन तिवारी बड़े दावेदार हैं। उन्होंने प्रचार भी शुरू कर दिया है। नजर तो ढाका विधायक फैसल रहमान और चनपटिया विधायक डॉ. शमीम की भी है। पूर्व विधायक लक्ष्मी नारायण यादव भी प्रयासरत हैं।

अतीत की हार-जीत

संसदीय सीटों के लिहाज से 1961 तक यह क्षेत्र अस्तित्व में नहीं था। पहली बार 1962 में परिसीमन के बाद कांग्रेस के टिकट पर भोला राउत एमपी बने। अगले चुनाव में कमलनाथ तिवारी आ गए, जो लगातार दो बार जीते। 1977 के चुनाव में जनता पार्टी के टिकट पर फजलुर रहमान सांसद बने। केदार पांडेय भी प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। 1980 में कांग्रेस ने यहां से उन्हें सांसद बनाया था।

1984 में मनोज पांडेय कांग्रेस के अंतिम सांसद हुए। उसके बाद यहां जनता दल की सियासत चलने लगी। 1989 में धर्मेश प्रसाद वर्मा एवं 1991 में फैयाज उल आजम लोकसभा पहुंचे। इसके बाद वर्तमान सांसद डॉ. संजय जायसवाल के पिता मदन प्रसाद जायसवाल पहली बार 1996 में भाजपा के टिकट पर सांसद चुने गए, जो लगातार तीन चुनाव जीते। 2004 में राजद के लिए रघुनाथ झा ने इसे जीता और केंद्र में मंत्री भी बने। 2009 के चुनाव के पहले बेतिया संसदीय सीट का अस्तित्व खत्म हो गया और पश्चिम चंपारण के नाम से जाना जाने लगा।

मुद्दे पर महाभारत

2014 में मोदी लहर में चंपारण के तमाम मुद्दे दरकिनार हो गए थे। वाल्मीकिनगर से चुनाव लड़ चुके लोजपा नेता हीरालाल राम को दर्द है कि तीन सांसद देने के बाद भी केंद्र सरकार की ओर से चंपारण के गन्ना किसानों के लिए कुछ नहीं किया गया। चार वर्षों में कोई खास काम नहीं हुआ।

पूरे बिहार में सड़कें बन रही हैं, लेकिन चंपारण की सड़कें बेहाल हैं। बेतिया के छावनी क्षेत्र में दो दशकों से ओवरब्रिज बनाने की मांग हो रही है किंतु नहीं बन रहा। जाम बहुत लगता है। अब विरोधी भी मुद्दा बना रहे हैं। थारू समुदाय की स्थिति आज भी वैसी ही है। 2003 में जार्ज फर्नांडीज की पहल पर उन्हें अनुसूचित जनजाति में शामिल किया गया था। जागृति नहीं आई है।

कुछ किया, कुछ होने वाला है

वर्तमान सांसद के पास कार्यों की लंबी सूची है। बेतिया से मनुआपुल तक एनएच 28 बनाया गया। गंडक पर पुल भी बन चुका। 850 करोड़ की लागत से तमकही से मनुआपुल तक एनएच एवं बेतिया से हाजीपुर तक नए एनएच बनने वाला है। बेतिया एवं रक्सौल में फोरलेन बाइपास का निर्माण हो चुका है। करीब सौ करोड़ की लागत से बेतिया छावनी ओवरब्रिज के लिए निविदा निकाल दी गई है। रक्सौल स्थित इंडियन ऑयल के डिपो को शहर से बाहर करने की तैयारी है। सुगौली के नजदीक बॉटलिंग प्लांट शुरू होने वाला है। रेलवे लाइन का विद्युतीकरण एवं दोहरीकरण भी शुरू होने वाला है।

Posted By: Amit Alok