पटना । जीवन के 20 वर्ष काफी परेशानी से भरा रहा। इस दरम्यान आत्महत्या करने के विचार भी मन में आते थे। सरकारी नौकरी और बिजनेस पहले भी सुलभ नहीं था। स्नातक करने के बाद रोजगार के लिए दर-दर की ठोकरें खाईं। ये बातें बुधवार को सुलभ इंटरनेशनल के संस्थापक पद्म भूषण डॉ. बिंदेश्वर पाठक ने पटना विश्वविद्यालय के अंग्रेजी विभाग में छात्रों से बातचीत में कहीं। उन्होंने कहा कि बीपी मिश्रा के 500 रुपये के कारण ही आज सुलभ इंटरनेशनल में 60,000 से अधिक कर्मी कार्यरत हैं। उन्होंने कहा कि जीवन की दुश्वारियों से परेशान होकर किसी कार्यवश 1973 में आरा नगरपालिका गया। साइनबोर्ड देखकर तत्कालीन अधिकारी बीपी मिश्रा को शौचालय निर्माण का आइडिया दिया। इस पर नगरपालिका परिसर में 500 रुपये देकर शौचालय बनाने को कहा। प्रयोग सफल रहा। इसके बाद पटना में रिजर्व बैंक के बगल में शौचालय का निर्माण कर उसका नाम 'सुलभ शौचालय' दिया। इसके बाद पीछे मुड़कर नहीं देखा।

ब्राह्माण हैं तो शौचालय का आइडिया कैसे आया

छात्रों ने उनसे पूछा कि ब्राह्माण परिवार में जन्म लेने के बाद शौचालय का आइडिया कैसे आया। उन्होंने कहा कि दायरे में रहकर आइडिया नहीं आते। हम सभी काम कर सकते हैं। अलग विचार के कारण ही तीन दर्जन से अधिक देशों ने सम्मानित किया। विकसित देश भी अपने यहां इसे अपना रहे हैं। इसलिए दायरे में अपने विचार को कभी नहीं रखें। हर समय बदलाव होता है। उसके अनुरूप खुद को अपडेट नहीं करने पर पीछे रह जाएंगे। मोबाइल का उपयोग यदि हम नहीं सीखेंगे तो कल्पना करें जीवन कितना कठिन हो जाएगा।

स्नातक के 16 साल बाद किया डबल एमए

पटना विश्वविद्यालय से 1980 में सामाजिक विज्ञान और 1986 में अंग्रेजी में स्नातकोत्तर की पढ़ाई पूरी की। पटना विश्वविद्यालय से ही पीएचडी की उपाधि 1985 में 'बिहार में कम लागत की सफाई-प्रणाली के माध्यम से सफाई कर्मियों की मुक्ति' विषय पर की थी। स्नातक 1964 में समाज शास्त्र से किया।

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