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‘आस्कर भाई’ से ‘बाऊजी’ तक..., ब‍िहार के संजय मिश्रा ने ऐसे बदली अपनी पहचान; अब मिला राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार

Published: Wed, 23 Sep 2026 03:09 PM (IST)

संजय मिश्रा को फिल्म 'भक्षक' में उनके शानदार अभिनय के लिए 72वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार में सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता का सम्मान मिला।

अलग-अलग भूम‍िकाओं में संजय म‍िश्रा। सौ-इंटरनेट

अलग-अलग भूम‍िकाओं में संजय म‍िश्रा। सौ-इंटरनेट

प्रभात रंजन, पटना। पर्दे पर चेहरा आते ही दर्शकों के चेहरे पर मुस्कान आ जाए और अगले ही पल वही कलाकार किसी गंभीर किरदार से मन को झकझोर दे—यह हुनर संजय मिश्रा को विशिष्ट बनाता है।

बिहार की मिट्टी से निकले इस अभिनेता ने हिंदी सिनेमा में खुद को किसी एक छवि तक सीमित नहीं रखा। कॉमेडी, गंभीरता, व्यंग्य, सामाजिक सरोकार और आम आदमी के संघर्ष—हर रंग के किरदार में उन्होंने अपनी अलग छाप छोड़ी।

अभिनय की इसी काबिलियत के लिए संजय मिश्रा को 72वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार समारोह में फिल्म ‘भक्षक’ के लिए सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता का सम्मान मिला।

मंगलवार शाम गुजरात में आयोजित समारोह में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने उन्हें रजत कमल और दो लाख रुपये की पुरस्कार राशि देकर सम्मानित किया।

‘भक्षक’ ने पहुंचाया राष्ट्रीय सम्मान तक

2024 में आई फिल्म ‘भक्षक’ ने संजय मिश्रा के अभिनय सफर को राष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान दी। फिल्म में उन्होंने संवेदनशील, साहसी और जमीनी पत्रकार ‘भास्कर सिन्हा’ की भूमिका निभाई। संवाद, भावनाओं और सहज अभिनय के जरिए उन्होंने इस किरदार को प्रभावशाली बनाया।

सामाजिक सरोकार और सच को सामने लाने की कोशिश करने वाले पत्रकार के रूप में उनके अभिनय को सराहा गया। इसी भूमिका के लिए उन्हें 72वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार में सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता चुना गया।

संजय मिश्रा को यह सम्मान मिलने से उनके परिवार के साथ उनके पैतृक गांव दरभंगा जिले के मनीगाछी प्रखंड स्थित नारायणपुर गांव में भी खुशी की लहर है। उनके लिए यह पुरस्कार अभिनय यात्रा का महत्वपूर्ण पड़ाव है और मिथिलांचल के लिए भी गौरव का विषय है।

Sanjay Mishra (1)

संजय मिश्रा ने अपने करियर में मुख्य अभिनेता से लेकर सहायक और हास्य भूमिकाओं तक, हर तरह के किरदार में अपनी मौजूदगी दर्ज कराई है।

उनके हिस्से में ‘दम लगा के हईशा’, ‘बाजीराव मस्तानी’, ‘दिलवाले’, ‘कड़वी हवा’, ‘अनारकली ऑफ आरा’, ‘गोलमाल अगेन’, ‘तान्हाजी: द अनसंग वारियर’, ‘भूल भुलैया 2’, ‘वध’, ‘भोला’, ‘भक्षक’, ‘भूल भुलैया 3’ और ‘सिंघम अगेन’ जैसी फिल्में आईं। उनकी फिल्मोग्राफी में 200 से अधिक अभिनय क्रेडिट दर्ज हैं।

‘आस्कर भाई’ से ‘बाऊजी’ तक

संजय मिश्रा के अभिनय का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि उन्होंने कॉमेडी को अपनी सीमा नहीं बनने दिया। रजत कपूर के निर्देशन में बनी ‘आंखों देखी’ में निभाया गया ‘बाऊजी’ का किरदार उनके करियर के निर्णायक पड़ावों में शामिल रहा।

फिल्म में साधारण जीवन जीने वाला एक व्यक्ति यह तय करता है कि वह केवल उसी बात को मानेगा, जिसे उसने खुद देखा और अनुभव किया है।

इस विचार के साथ कहानी दार्शनिक रंग लेती है। संजय मिश्रा ने ‘बाऊजी’ के किरदार को बेहद सहजता से निभाया। फिल्म के लिए उन्हें फिल्मफेयर क्रिटिक्स अवार्ड में सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का सम्मान मिला।

इसके बाद ‘मसान’ में विद्याधर पाठक की भूमिका ने उनके अभिनय का एक और गंभीर पक्ष सामने रखा। फिल्म के लिए उन्हें जी सिने अवार्ड में सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता का क्रिटिक्स च्वाइस सम्मान मिला।

2022 की ‘वध’ में संजय मिश्रा ने फिर अभिनय का अलग रंग दिखाया। फिल्म में उनके काम को सराहा गया और उन्हें फिल्मफेयर क्रिटिक्स अवार्ड में सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का सम्मान मिला।

इससे पहले ‘कामयाब’ में उन्होंने ऐसे चरित्र अभिनेता की भूमिका निभाई, जिसने पूरी जिंदगी छोटी-छोटी भूमिकाएं निभाईं और 500वीं फिल्म पूरी करने का सपना देखा।

Sanjay Mishra 1

पटना से रहा है गहरा लगाव

संजय मिश्रा की पारिवारिक पृष्ठभूमि भी समृद्ध रही है। उनके पिता स्वर्गीय शंभुनाथ मिश्रा सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय में कार्यरत थे और पत्रकारिता से भी जुड़े रहे।

संजय मिश्रा का बचपन पटना, बनारस और दिल्ली में बीता। उनकी शुरुआती शिक्षा पटना के सेंट जेवियर्स हाई स्कूल में हुई।

बचपन में वह किताबों से ज्यादा आसपास के लोगों को देखने और उनकी नकल उतारने में रुचि लेते थे। पिता के तबादले के बाद उनका बचपन बनारस के घाटों और गलियों में बीता।

संजय मिश्रा का पटना से जुड़ाव आगे भी बना रहा। स्वच्छता सर्वेक्षण 2021 के लिए उन्हें पटना नगर निगम का ब्रांड एंबेसडर बनाया गया था।

वर्ष 2018 में उन्होंने ‘डेथ ऑन संडे’ की शूटिंग पटना में की थी। फिल्म में उनके साथ काम करने वाले कई कलाकार बिहार और खासकर पटना से जुड़े थे।

फिल्म की शूटिंग पटना के गुलबी घाट, बांस घाट, बाजार समिति, कदमकुआं, डाकबंगला चौराहा, गोलघर, सलीमपुर अहरा, पटना सिटी और फुलवारीशरीफ सहित कई स्थानों पर हुई थी।

उनके रिश्तेदारों के अनुसार, जब भी संजय मिश्रा पटना आते हैं, वह अपने पसंदीदा स्थानों का भ्रमण करते हैं और कई दिनों तक यहां समय बिताते हैं।

छोटे पर्दे से बड़े पर्दे तक का सफर

छह अक्टूबर 1963 को जन्मे संजय मिश्रा ने अभिनय की शुरुआत टेलीविजन से की। ‘चाणक्य’ और बाद में ‘ऑफिस-ऑफिस’ जैसे धारावाहिकों ने उन्हें पहचान दिलाई। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से प्रशिक्षण लेने के बाद उन्होंने फिल्मों का रुख किया।

शुरुआती दौर में उन्हें कई फिल्मों में छोटे किरदार मिले, लेकिन उनकी खासियत यही रही कि भूमिका कितनी भी छोटी हो, उनका अभिनय दर्शकों की स्मृति में रह जाता था।

‘सत्या’, ‘दिल से..’, ‘जमीन’, ‘प्लान’, ‘चरस’ और ‘बंटी और बबली’ जैसी फिल्मों से आगे बढ़ते हुए उन्होंने अलग-अलग तरह के किरदार निभाए।

2006 में ‘गोलमाल: फन अनलिमिटेड’ और 2007 में ‘धमाल’ ने उन्हें बड़े दर्शक वर्ग तक पहुंचाया। इसके बाद ‘वेलकम’, ‘गोलमाल रिटर्न्स’, ‘ऑल द बेस्ट: फन बिगिन्स’ और ‘फंस गए रे ओबामा’ जैसी फिल्मों ने उनकी कॉमिक टाइमिंग को लोकप्रिय बनाया।

पुरस्कारों ने बताई अभिनय की अलग कहानी

संजय मिश्रा को फिल्मफेयर क्रिटिक्स अवार्ड—सर्वश्रेष्ठ अभिनेता (‘आंखों देखी’), फिल्मफेयर क्रिटिक्स अवार्ड—सर्वश्रेष्ठ अभिनेता (‘वध’) और जी सिने क्रिटिक्स च्वाइस अवार्ड—सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता (‘मसान’) सहित कई सम्मान और नामांकन मिले हैं।

‘कामयाब’ के लिए भी उन्हें फिल्मफेयर क्रिटिक्स श्रेणी में नामांकन मिला। ‘गिद्ध: द स्कैवेंजर’ के लिए शॉर्ट फिल्म श्रेणी में भी उन्हें अभिनय सम्मान मिला। अब ‘भक्षक’ के लिए मिला राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार उनके लंबे अभिनय सफर में एक और महत्वपूर्ण अध्याय जोड़ता है।

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