पटना [अरविंद शर्मा]। लालू-राबड़ी सहित राष्‍ट्रीय जनता दल (राजद) के वरिष्ठों के हस्तक्षेप से लालू परिवार में वर्चस्व के विवाद को फिलहाल सुलझा-सलटा लिया गया है। लेकिन, लालू प्रसाद यादव के बड़े बेटे तेज प्रताप यादव के तल्ख तेवर देखकर पूरी पार्टी हतप्रभ है। तेज प्रताप ने पार्टी में अपनी अनदेखी तथा इसमें असामाजिक तत्‍वों के जमावड़ा की बातें कह सनसनी फैला दी थी। इससे तीन दिनों तक समर्थक हैरान रहे तो पार्टी के लोग परेशान। राजद के विरोधी दलों को भी पारिवारिक झगड़े के क्लाइमेक्स तक पहुंचने का इंतजार था।

पहली बार सार्वजनिक हुई तल्खी
दरअसल, तेज प्रताप की तल्खी पहली बार लालू-राबड़ी आवास की चारदीवारी को पार कर सार्वजनिक हुई थी। धार्मिक स्वभाव के तेजप्रताप बयानों में विरोधी दलों के नेताओं की जमकर खबर लेते रहे हैं, लेकिन परिवार के प्रति उनका व्यवहार अभी तक संयमित, शांत और शालीन देखा गया था। 

इसके पहले कभी नहीं खोला था मुंह
तेज प्रताप अपनी सीमा से भी वाकिफ हैं। यही वजह है कि उन्होंने उस वक्त भी मुंह नहीं खोला, जब छोटे भाई को पारिवारिक सहमति से लालू का राजनीतिक वारिस घोषित किया गया। यहां तक कि पार्टी में तेजस्वी के बढ़ते कद-पद और दायरे के बावजूद खुद को अपने भाई का सारथी समझकर ही वह गौरवान्वित होते रहे। महागठबंधन सरकार के दौरान न तो डिप्टी सीएम की कुर्सी पर नजर गड़ाई और न ही सत्ता से बेदखल होने पर नेता प्रतिपक्ष पद के लिए मचले।

हर दौर में करते रहे समभाव से सियासत
तेज प्रताप हर दौर में समभाव से सियासत करते रहे, जिससे पार्टी के लोग भी मान चुके थे कि तेज प्रतापपारिवारिक अनुशासन से बाहर नहीं निकलने वाले हैं। ऐसे में पहली बार जब उन्होंने पार्टी और परिवार में अपने मान-सम्मान का मुद्दा उठाया और खुलकर बातें रखीं तो सबका भौचक होना लाजिमी है।

बढ़ सकती थी परिवार की परेशानी 
तेज प्रताप के तेवर से राजद समर्थकों को हैरानी इसलिए हुई कि पार्टी अभी नाजुक और पुनर्निर्माण के दौर से गुजर रही है। लालू प्रसाद गंभीर रूप से बीमार हैं। राबड़ी देवी, मीसा भारती एवं तेजस्वी समेत परिवार के अन्य सदस्य भी कानूनी झंझटों में फंसे हैं। केंद्रीय जांच एजेंसियों का शिकंजा प्रतिदिन कसता जा रहा है। ऐसे में तेज प्रताप की बेबाकी से लालू परिवार की परेशानियों की सूची लंबी हो सकती थी।  

लोकसभा चुनाव के पहले ऐसी प्रवृत्ति को लालू समर्थक आत्मघाती मानने लगे थे। उन्हें लगने लगा था कि विवादों पर जल्द विराम नहीं लगा तो मैदान में जाने से पहले पार्टी पस्त हो सकती है।

सबक दे गई तेज प्रताप की बेबाकी 
भावुक प्रवृत्ति के तेज प्रताप के दिल में कौन सी बात कब खटक जाए, इसकी कोई गारंटी नहीं। विवाद का पटाक्षेप करने की कोशिश करते हुए तेजस्वी यादव ने सफाई दी कि राजेंद्र पासवान को पार्टी में पद देने की तेज प्रताप की पैरवी सुनने में देर इसलिए हुई कि वह पार्टी के संविधान के मुताबिक नहीं थी। अंदर की बात चाहे जो रही हो, लेकिन यह तर्क तेजप्रताप पर लागू नहीं होता, क्योंकि वे पार्टी के कायदे से नहीं, दिल से सोचते, बोलते और करते हैं। इसलिए तेज प्रताप का हालिया तेवर लालू परिवार और पार्टी पदाधिकारियों के लिए सबक साबित हो सकता है।

Posted By: Amit Alok