पटना [अरविंद शर्मा]। मान-मनौव्वल और भारी मशक्कत के बाद तेजस्वी यादव को राजी करके राजद ने लोकसभा चुनाव में हार से सबक लेते हुए आंतरिक तौर पर बहुत कुछ बदलने का संकेत दिया है। सबसे बड़ा बदलाव सामाजिक न्याय के लिए संघर्ष के संकल्पों में दिख रहा है। आर्थिक आधार पर गरीब सवर्णों के आरक्षण का प्रबल विरोधी राजद ने अपने राजनीतिक एजेंडे से इसे पूरी तरह दूर रखा है।

लालू प्रसाद के आधार वोटरों की हिफाजत के साथ-साथ समर्थन के दायरे को व्यापक करने की तैयारी है। शायद इसीलिए संगठन में 60 फीसद हिस्सेदारी अति पिछड़ों और एससी-एसटी को देने का वादा किया गया है। 

24 राज्यों के प्रदेश अध्यक्षों की भागीदारी वाली राजद की राष्ट्रीय कार्यकारिणी ने जिस राजनीतिक प्रस्ताव को मंजूरी दी है, उसमें सांप्रदायिकता और सामाजिक न्याय के मुद्दों पर अड़े-खड़े रहने का प्रमुखता से जिक्र तो किया गया है, लेकिन रघुवंश प्रसाद सिंह और शिवानंद तिवारी जैसे वरिष्ठ नेताओं के सुझावों और नसीहतों पर अमल करके आगे बढऩे का संकेत भी दिख रहा है। 

देश-प्रदेश की राजनीति में लालू प्रसाद को स्थापित करने वाले सामाजिक न्याय के परंपरागत नारे को लोकसभा चुनाव के नतीजे ने हिलाकर रख दिया है।

हार के कारणों की समीक्षा की रिपोर्ट से सहमत होते हुए तेजस्वी ने सार्वजनिक तौर पर स्वीकार किया कि उनकी राजनीतिक लाइन वक्त की जरूरतों के हिसाब से पूरी तरह सटीक नहीं थी। सामाजिक न्याय के आंदोलनों का लाभ कुछ जातियों तक सिमटकर रह गया है। उनका संकेत यादव, कुर्मी और कुशवाहा सरीखी जातियों की ओर है, जिन्हें पिछड़ी जातियों में अब अगड़ा मान लिया जाता है।

जाहिर है, मध्य बिहार में पिछड़ों के लिए लड़ाई लडऩे वाले जगदेव प्रसाद के सौ में अस्सी फीसद पिछड़ों की हिस्सेदारी के नारों को आत्मसात करते हुए समाजवादी नेता कर्पूरी ठाकुर ने बिहार में सत्तर और अस्सी के दशक में जिस सामाजिक न्याय का आंदोलन खड़ा किया था, वह लालू तक आते-आते कुछ दबंग पिछड़ी जातियों तक सिमटकर रह गया।

राजद के थिंक टैंक का मानना है कि सामाजिक और आर्थिक रूप से जो वर्ग आज भी पिछड़े हैं, सियासत में उनकी भागीदारी बढऩी चाहिए। करीब छह हफ्ते के बाद पार्टी के किसी सार्वजनिक कार्यक्रम में शिरकत करने वाले राजद के मुख्यमंत्री प्रत्याशी तेजस्वी यादव ने स्वीकार भी किया है कि उनसे कुछ गलतियां हुई हैं, जिसे ठीक करना है। नया तरीका अपनाना है और सबको साथ लेकर चलना है। 

इस नए तरीके और सबको साथ लेकर चलने के वादे को तेजस्वी की सियासत की नई शैली मानी जा रही है, जिसे वरिष्ठ जनों की नसीहत से जोड़कर भी देखा जा रहा है। लालू प्रसाद के करीबी शिवानंद तिवारी ने शीर्ष नेतृत्व पर एक ही जाति से घिरे रहने के खामियाजा और खतरे की ओर संकेत किया था और तेजस्वी को अपना तौर-तरीका बदलने की हिदायत दी थी।

रघुवंश प्रसाद सिंह का इशारा भी तकरीबन इसी ओर था। उन्होंने साफ कहा था कि आधार वोटरों पर अतिशय निर्भरता के चलते चुनाव में हार मिली है। दूसरी जातियों, समुदायों और वर्गों का भी कद्र किया जाता तो राजद का ऐसा हश्र नहीं होता। 

Posted By: Kajal Kumari

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