पटना [ अरुण सिंह]। करीब 20 साल बाद बिहार में रणजी ट्राफी का मैच बुधवार को पटना के मोइनुल हक स्टेडियम में हो रहा है। मुकाबले की शुरुआत बिहार व सिक्किम के मैच से हुई है। इस सत्र में दो मैचों में महज एक अंक मिलने से बिहार के लिए इस मुकाबले की अहमियत बढ़ गई है। इस लिहाज से मेजबान टीम सिक्किम पर बड़ी जीत दर्ज करना चाहेगी, जिससे उसके अंकों के साथ रन औसत में भी इजाफा हो सके।
पिच में परिवर्तन की संभावना कम
बीसीसीआइ के न्यूट्रल पिच क्यूरेटर ओडिशा के पंकज पटनायक और मैच रेफरी सुनील चतुर्वेदी ने मैच के एक दिन पूर्व विकेट और मैदान का निरीक्षण किया और तैयारी पर संतुष्टि जताई। इस दौरान बीसीसीआइ के सहायक क्यूरेटर पटना के राजू वाल्स भी मौजूद थे। पंकज के अनुसार, मौसम को देखते हुए चारों दिन विकेट में ज्यादा परिवर्तन होने की संभावना बहुत कम है। शुरू के दो दिन इस पर रनों की बरसात हो सकती है। इस कारण टॉस जीतने वाली टीम पहले बल्लेबाजी करना पसंद करेगी। बिहार पहली पारी में चार सौ रन का आंकड़ा पार कर मेहमानों पर दबाव बनाना चाहेगा।
स्थानीय खिलाड़ियों पर होगा दरोमदार
इसके लिए बिहार को ठोस शुरुआत की दरकार होगी। हेमन ट्रॉफी में दोहरा शतक जमाने वाले स्थानीय खिलाड़ी इंद्रजीत कुमार और कुमार रजनीश पारी की शुरुआत करेंगे। अगर दोनों शानदार आगाज करने में कामयाब रहे तो मध्यक्रम में कप्तान बाबुल, केशव कुमार और रहमत-उल्लाह-शाह रुख रनों का पहाड़ खड़ा कर सकते हैं।
60 साल पहले गांधी मैदान में खेला गया था पहला रणजी मैच


बिहार को पहले रणजी मैच की मेजबानी आज से 60 साल पूर्व 1958 में मिली थी। रैलियों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के आयोजन के लिए मशहूर पटना के ऐतिहासिक गांधी मैदान में यह मैच जनवरी माह में खेला गया था। तब न कोई बापू की मूर्ति वहां थी और न ही कोई मेला-ठेला लगता था। बीच मैदान में चारों तरफ झंडे लगाकर 65 गज की बाउंड्री बनाई गई थी, जिसके किनारे मैदान पर बैठकर मैच देखने वालों का हुजूम लगा था।
बहरहाल घर में बिहार का आगाज खराब रहा और बंगाल के खिलाफ उस मुकाबले को उसने एक पारी 26 रन से गंवा दिया।
अगले साल 1959 में गांधी मैदान को दोबारा मेजबानी मिली। इस बार बिहार ने ओडिशा को आठ विकेट से हराया और इसके साथ ही इस मैदान से उसने विदाई भी ली। 1968 में मोइनुल हक स्टेडियम बनने के बाद तीसरी बार बिहार को रणजी के आयोजन कराने का गौरव हासिल हुआ। तब से लेकर अब तक मोइनुल हक स्टेडियम में ही रणजी मुकाबले हो रहे हैं। इस दौरान बिहार की टीम ओडिशा और असम पर भारी पड़ी, लेकिन बंगाल से वह कभी पार नहीं पा सकी।
1970 के जनवरी माह में एक बार फिर बंगाल सामने था, जिसमें उसे एक पारी और 123 रनों से करारी शिकस्त झेलनी पड़ी। उसी साल दिसंबर में बिहार का सामना ओडिशा से हुआ, जिसे उसने पारी और 135 रनों से जीता। तीन साल बाद 1973 में बिहार को अपने घर में खेलने का मौका मिला। दिसंबर माह में हुए उस मुकाबले में असम की टीम सामने थी, जिसे बिहार ने नौ विकेट से अपने नाम किया। 1976 में तीसरी बार ओडिशा की मेहमाननवाजी करने का मौका बिहार को मिला, जिसमें उसने विपक्षी पर अपना वर्चस्व कायम रखते हुए एक पारी और 226 रनों से जीत हासिल की। बिहार की घर में यह आखिरी जीत थी। तब से लेकर अब तक या तो वह हारा है या फिर मैच ड्रा रहे हैं।
23 मैच खेले हैं धौनी ने बिहार के लिए
टीम इंडिया के श्रेष्ठतम कप्तानों में से एक महेंद्र सिंह धौनी संजय गांधी स्टेडियम में चौके-छक्के लगा चुके हैं। बिहार की ओर से वे 23 रणजी मैच भी खेल चुके हैं। इसके बावजूद उन्हें अपने घर में खेलने का अवसर नहीं मिला। धौनी ने जब 1999 में रणजी खेलना शुरू किया तो बिहार का विभाजन हो चुका था और वे झारखंड जा चुके थे। हालांकि, तब से लेकर 2003-04 सत्र तक झारखंड की टीम बिहार के नाम पर खेलती थी और धौनी उसका हिस्सा रहे।
साल 2000 में बिहार की ओर से धौनी ने अपने रणजी करियर का पहला नाबाद शतक (114 रन) कोलकाता में बंगाल के खिलाफ बनाया था। इसके बाद उन्होंने जमशेदपुर और रांची में दो बार 96 रनों की पारी भी खेली। 2005 में बिहार को दरकीनार कर बीसीसीआइ ने झारखंड को पूर्ण मान्यता दे दी और इसके साथ ही धौनी अपने राज्य से हमेशा के लिए जुदा हो गए।

Posted By: Akshay Pandey

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