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बांकीपुर में PK की जीत, 8 साल पुराने गोरखपुर उपचुनाव की याद ताजा; BJP के गढ़ में प्रशांत किशोर ने रचा नया इतिहास

Published: Mon, 03 Aug 2026 06:02 PM (IST)

पटना के बांकीपुर उपचुनाव में प्रशांत किशोर की जीत ने बिहार की राजनीति में बड़ा संदेश दिया है, जिसने बीजेपी के गढ़ में वर्षों पुराने समीकरण बदल दिए हैं।

नितिन नवीन के गढ़ में PK की सेंध

नितिन नवीन के गढ़ में PK की सेंध

HighLights

  1. प्रशांत किशोर ने बांकीपुर उपचुनाव में ऐतिहासिक जीत हासिल की।

  2. बीजेपी के पारंपरिक गढ़ बांकीपुर में जन सुराज की सेंध।

  3. यह जीत बिहार में तीसरे राजनीतिक विकल्प को मजबूत करेगी।

डिजिटल डेस्क, पटना। पटना के बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव में प्रशांत किशोर की जीत ने बिहार की राजनीति में बड़ा सियासी संदेश दिया है। बीजेपी के मजबूत गढ़ माने जाने वाले बांकीपुर में जन सुराज के उम्मीदवार की जीत ने वर्षों से चले आ रहे राजनीतिक समीकरण को बदल दिया है।

इस नतीजे ने आठ साल पहले उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में हुए उस उपचुनाव की याद भी ताजा कर दी, जब बीजेपी को अपने पारंपरिक गढ़ में हार का सामना करना पड़ा था।

गोरखपुर के बाद अब बांकीपुर की बारी

साल 2018 में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के लोकसभा सीट छोड़ने के बाद गोरखपुर में हुए उपचुनाव में बीजेपी को हार मिली थी।

समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार प्रवीण निषाद ने बीजेपी के उपेंद्र दत्त शुक्ल को 21,881 वोटों से हराया था। गोरखपुर लंबे समय से बीजेपी का मजबूत क्षेत्र माना जाता था, इसलिए उस हार ने राष्ट्रीय राजनीति में खूब चर्चा बटोरी थी।

अब बांकीपुर में प्रशांत किशोर की जीत को भी उसी तरह के राजनीतिक उलटफेर के रूप में देखा जा रहा है।

नितिन नवीन के गढ़ में PK की सेंध

बांकीपुर लंबे समय से बीजेपी का मजबूत किला रहा है। यह सीट नितिन नवीन की पारंपरिक सीट रही और यहां पार्टी का संगठन तथा शहरी मतदाताओं के बीच मजबूत आधार माना जाता रहा है।

ऐसे में प्रशांत किशोर की जीत केवल एक विधानसभा सीट का परिणाम नहीं, बल्कि बीजेपी के स्थापित राजनीतिक समीकरण को चुनौती देने वाली घटना के तौर पर देखी जा रही है।

बिहार में तीसरे विकल्प की दस्तक

प्रशांत किशोर की जीत जन सुराज के लिए भी बड़ी राजनीतिक उपलब्धि है। बीजेपी और आरजेडी के बीच लंबे समय से केंद्रित बिहार की राजनीति में यह नतीजा तीसरे राजनीतिक विकल्प की संभावनाओं को मजबूत कर सकता है।

खासकर शहरी मतदाताओं के बीच जन सुराज की स्वीकार्यता को लेकर अब नई बहस शुरू होने की संभावना है।

बीजेपी के लिए मंथन का वक्त

बांकीपुर जैसी सीट पर हार बीजेपी के लिए संगठन और चुनावी रणनीति के स्तर पर मंथन का कारण बन सकती है।

पार्टी को अब यह समझना होगा कि उसके पारंपरिक वोटर के बीच जन सुराज ने किस तरह जगह बनाई। वहीं प्रशांत किशोर के सामने इस जीत को राज्यव्यापी राजनीतिक विस्तार में बदलने की चुनौती होगी।

क्या बिहार की राजनीति में बदलेगा समीकरण?

गोरखपुर की तरह बांकीपुर का नतीजा भी एक संदेश लेकर आया है-मजबूत माने जाने वाले राजनीतिक किले भी हमेशा अजेय नहीं रहते।

प्रशांत किशोर की जीत ने जन सुराज को बिहार की सियासत में नई पहचान दी है। अब देखना यह होगा कि बांकीपुर की यह जीत केवल एक सीट तक सीमित रहती है या बिहार की राजनीति में नए ‘तीसरे विकल्प’ की नींव मजबूत करती है।

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