पटना [अरविंद शर्मा]। जातीय आधार पर मतदान के लिए बदनाम बिहार की राजनीति नए रास्ते पर चल पड़ी है। हालांकि, पक्ष-विपक्ष के नेताओं में आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला सुबह-शाम सरेआम जारी है, किंतु इसके बावजूद अब जातीय गठजोड़ का फॉर्मूला हाशिये पर है और समूहों को टारगेट करके मानव विकास के आधार पर राजनीति का ट्रेंड सेट किया जाने लगा है।
बदल रहे वोट बैंक के मायने
नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली राजग सरकार के पिछले नौ महीने की कार्यशैली एवं गतिविधियों का अवलोकन करें तो सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध युद्ध और सात निश्चय के जरिए किसानों, आधी आबादी, विद्यार्थियों एवं बेरोजगारों के मुद्दों पर सबसे ज्यादा फोकस किया गया है। जाहिर है, जातीय सम्मेलनों, आंदोलनों और वर्ग संघर्ष की पहचान वाले प्रदेश की सियासत में यह नई किस्म का बदलाव है। सत्ता पक्ष ने अगर इसे इसी तरह जारी रखा तो अगले कुछ वर्षों में वोट बैंक का मायने बदलना तय है।

अचानक नहीं आया बदलाव
जदयू प्रवक्ता नीरज कुमार के शब्दों में मुद्दों पर राजनीति करने वाली सरकार में यह अचानक बदलाव नहीं है। 2005 में जब पहली बार राज्य में नीतीश कुमार की सरकार बनी थी तो पंचायतों और नगर निकायों में आधी आबादी के लिए 50 फीसद आरक्षण देकर तय कर दिया गया था कि जातीय राजनीति के दिन अब लदने वाले हैं।
बदला जातिवादी नजरिया
राज्य सरकार के इस कदम से दबे-कुचले एवं दलितों-वंचितों को जातीय चश्मे से देखने का नजरिया बदल गया। नक्सल आंदोलनों की हवा निकल गई और नरसंहारों पर नियंत्रण हो सका। बाद में राज्य सरकार की सभी नौकरियों में 35 फीसद आरक्षण की व्यवस्था करके आधी आबादी को जातीय मानसिकता से इतर मतदान केंद्रों तक पहुंचने का रास्ता तय कर दिया गया।

किसानों व युवाओं पर नजर
दो दिन पहले नीतीश सरकार ने सब्जी की जैविक खेती के लिए किसानों को छह-छह हजार रुपये का अग्रिम अनुदान देकर राज्य के दूसरे सबसे बड़े वर्ग को मुरीद बनाने की कोशिश की है। बिहार की 76 फीसद आबादी खेती पर निर्भर है। नीतीश को बेहतर पता है कि किसानों एवं खेतिहर मजदूरों की आमदनी बढ़ाकर राज्य की तीन चौथाई आबादी की दशा-दिशा में परिवर्तन लाने की कवायद कालांतर में वोट बैंक में तब्दील हो सकती है। केंद्र से इतर राज्य सरकार की अपनी फसल बीमा योजना की तैयारी को भी इसी मकसद से जोड़कर देखा जा रहा है।|
स्टूडेंट क्रेडिट कार्ड के जरिए अगले तीन सालों में ढाई लाख युवाओं को सहारा देकर मानसिकता में परिवर्तन की पहल का संकेत साफ है कि नई पीढ़ी को पुराने राजनीतिक रोग से बचाना है। स्वस्थ मानसिकता के साथ उन्हें मतदान केंद्रों का रास्ता बताना है।
विपक्ष भी अनुसरण को बाध्य
मानव विकास पर फोकस कर नीतीश कुमार की दो दशक की राजनीति और पिछले चुनाव के नतीजों ने सबको अहसास करा दिया है कि पब्लिक को महज बयानबाजी नहीं, बल्कि बिजली, पानी, शिक्षा, सड़क और संचार के साधनों की दरकार है।
यही कारण है कि राज्य सरकार की पहल का विपक्ष भी अनुसरण करने में पीछे नहीं रहे। यहां तक कि माय समीकरण के सहारे वर्षों तक सूबे की सियासत में शीर्ष पर रहे राजद के स्वर और राजनीति के तौर-तरीके भी बदलने लगे हैं। नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव के एजेंडे में महिलाएं एवं बेरोजगार प्रमुखता से शामिल हैं। उनके भी बयानों में काम-धंधे की कमी, बेरोजगारी, कारोबार की दुर्गति एवं किसानों की आय की मुकम्मल इंतजाम के मुद्दे शामिल होते हैं।
नीतीश कुमार का राजनीतिक सफर, एक नजर
नीतीश कुमार 1985 में पहली बार बिहार विधानसभा के लिए निर्वाचित हुए। 1987 में वे युवा लोकदल के अध्यक्ष बने। 1989 में उन्हें बिहार में जनता दल का सचिव चुना गया। उसी वर्ष वे नौंवी लोकसभा के सदस्य भी बने।
नीतीश कुमार 1990 में पहली बार केन्द्रीय मंत्रीमंडल में बतौर कृषि राज्यमंत्री शामिल हुए। 1991 में वे फिर लोकसभा के लिए चुने गये। इस बार उन्‍हें जनता दल का राष्ट्रीय सचिव चुना गया। संसद में वे जनता दल के उपनेता भी बने।
1989 से 2000 तक उन्होंने बाढ़ लोकसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया। वे 1998-99 में कुछ समय के लिए केन्द्रीय रेल एवं भूतल परिवहन मंत्री भी रहे। अगस्त 1999 में गैसाल में हुई रेल दुर्घटना के बाद उन्होंने मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया।
सन 2000 में वे बिहार के मुख्यमंत्री बने, लेकिन उन्हें सात दिनों में ही त्यागपत्र देना पड़ा। उसी साल वे फिर से केन्द्रीय मंत्रीमंडल में कृषि मंत्री बने। मई 2001 से 2004 तक वे बाजपेयी सरकार में केन्द्रीय रेलमंत्री रहे। आगे 2004 के लोकसभा चुनाव में वे बाढ़ की सीट हार गये।

नवंबर 2005 में नीतीश कुमार राष्ट्रीय जनता दल (राजद) की बिहार में 15 साल पुरानी सत्ता को उखाड़ फेंकने में सफल रहे। मुख्यमंत्री के रूप में उनकी ताजपोशी हुई। सन् 2010 के बिहार विधानसभा चुनावों में अपनी सरकार द्वारा किये गये विकास कार्यों के आधार पर वे भारी बहुमत से अपने गठबंधन को जीत दिलाने में सफल रहे और पुन: मुख्यमंत्री बने।
नीतीश कुमार 2005 से 2014 तक राजग सरकार में बिहार के मुख्यमंत्री रहे। उन्‍होंने नवंबर 2015 में बिहार विधान सभा चुनाव जीता और महागठबंधन सरकार में मुख्‍यमंत्री बने। महागठबंधन में मतभेद के बाद नीतीश कुमार ने 26 जुलाई 2017 को मुख्यमंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया और अगले ही दिन अपने पूर्व सहयोगी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) के साथ फिर से सत्ता में आ गए। फिलहाल वे राजग सरकार में मुख्‍यमंत्री हैं।

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