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बेतिया के 'राजू' और असम की 'कांछी' से शुरू हुई कहानी, पटना जू में 25 गैंडों का हुआ सफल प्रजनन

Published: Mon, 21 Sep 2026 11:51 PM (IST)

पटना जू एक सींग वाले गैंडों के संरक्षण और प्रजनन में विश्व के अग्रणी चिड़ियाघरों में से एक है। यहां ...और पढ़ें

पटना जू में गैंडा। (जागरण)

पटना जू में गैंडा। (जागरण)

HighLights

  1. पटना जू गैंडा संरक्षण में विश्व के अग्रणी चिड़ियाघरों में से एक।

  2. कुल 34 गैंडों में से 25 का जन्म पटना जू में ही हुआ।

  3. गैंडा संरक्षण 1979 में कांछा-कांछी के आगमन से हुआ प्रारंभ।

जागरण संवाददाता, पटना। संजय गांधी जैविक उद्यान यानी पटना जू की पहचान सिर्फ हरियाली और वन्यजीवों से नहीं, बल्कि एक सींग वाले गैंडों के संरक्षण की लंबी और गौरवपूर्ण यात्रा से भी जुड़ी है।

गैंडों की संख्या के मामले में पटना जू विश्व के चिड़ियाघरों में दूसरे स्थान पर है। वर्तमान में यहां चार अलग-अलग नस्लों के 10 गैंडे हैं, जिनमें छह नर और चार मादा हैं। विश्व गैंडा दिवस पर इनकी कहानी संरक्षण की ऐसी उपलब्धि सामने लाती है, जिसने पटना जू को खास पहचान दिलाई है। विश्व गैंडा दिवस रिपोर्ट।

पटना जू में गैंडा संरक्षण की शुरुआत 28 मई 1979 को हुई, जब असम से नर ‘कांछा’ और मादा ‘कांछी’ को लाया गया। करीब तीन वर्ष बाद 28 मार्च 1982 को बेतिया से रेस्क्यू किया गया नर गैंडा ‘राजू’ भी यहां पहुंचा।

बेहतर प्रबंधन और अनुकूल वातावरण का परिणाम आठ जुलाई 1988 को सामने आया, जब राजू और कांछी के मिलन से मादा गैंडा ‘हड़ताली’ का जन्म हुआ। इसके बाद ‘रानी’ ने पटना जू में गैंडा प्रजनन की उम्मीद को और मजबूत किया।

1991 तक यहां गैंडों की संख्या पांच हो गई। इसके बाद 19 दिसंबर 1993 को कांछा-कांछी से नर ‘राजा’ का जन्म हुआ। 1988 में जन्मी ‘हड़ताली’ ने 1997 में नर ‘बजरंगी’ को जन्म दिया।

नस्ल की गुणवत्ता बढ़ाने के लिए वन्यजीव अदला-बदली कार्यक्रम के तहत 2005 में दिल्ली चिड़ियाघर से नर ‘अयोध्या’ तथा 2007 में सैन डिएगो जू से मादा ‘गैरी’ और शिशु ‘लाली’ को लाया गया।

पटना जू में कुल 34 गैंडे

अब तक पटना जू में कुल 34 गैंडे रखे गए, जिनमें 25 का जन्म यहीं हुआ है। वर्ष 2011 से 2020 के बीच ही 10 गैंडों का जन्म हुआ। यहां जन्मे गैंडों ने दूसरे चिड़ियाघरों के संरक्षण कार्यक्रमों में भी योगदान दिया है। इस तरह पटना जू में गैंडा सिर्फ आकर्षण नहीं, बल्कि संरक्षण, प्रजनन और जैव विविधता बचाने की जीवंत कहानी बन चुका है।

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