बचपन में पिता को खोया, मां ने सिलाई मशीन चलाकर पाला; अब गरीब बच्चों का फ्यूचर बना रही पटना की स्नेहा
पटना की स्नेहा, जिन्होंने बचपन में पिता को खोया और मां के संघर्ष को देखा, अब 150 गरीब बच्चों को ...और पढ़ें

मुसीबतों ने बताई शिक्षा की अहमियत तो बच्चों का भविष्य सुधारने में जुट गईं स्नेहा
HighLights
पटना की स्नेहा 150 गरीब बच्चों को मुफ्त शिक्षा दे रही हैं।
मां के संघर्ष से प्रेरित होकर शिक्षा का महत्व समझा।
कूड़ा बीनने वाले बच्चों को मुख्यधारा से जोड़ रही हैं।
सोनाली दुबे, पटना। उम्र महज एक वर्ष थी, जब सड़क हादसे में पिता का साया सिर से उठ गया। घर की जिम्मेदारी मां के कंधों पर आ गई। सिलाई मशीन की खटर-पटर के बीच बचपन बीता। मां को दिन-रात मेहनत करते देखा तो मुश्किलों से लड़ने का हौसला भी मिला।
अभावों में पली-बढ़ीं पटना की 21 वर्षीय स्नेहा आज उन बच्चों की जिंदगी में शिक्षा का उजाला भर रही हैं, जिनका बचपन गरीबी और मजबूरियों के बीच गुम हो रहा था। कभी कूड़ा बीनने वाले तो कभी परिवार की आजीविका में हाथ बंटाने वाले ऐसे 150 बच्चों को वह निश्शुल्क शिक्षा दे रही हैं।

स्नेहा के पिता बढ़ई थे। उनके निधन के बाद मां ने सिलाई को आजीविका का सहारा बनाया और दोनों बेटियों की परवरिश की। सीमित आमदनी में घर चलाना और बेटियों को पढ़ाना आसान नहीं था।
मां के इसी संघर्ष ने स्नेहा को दूसरों का दर्द समझना सिखाया। आसपास की बस्तियों में बच्चों को कूड़ा बीनते और पढ़ाई से दूर देखकर उनके मन में सवाल उठता कि आखिर गरीबी इन बच्चों से शिक्षा का अधिकार क्यों छीन रही है? इसी सवाल ने कुछ करने का संकल्प जगाया।

बीए की पढ़ाई कर रहीं स्नेहा ने अपनी पढ़ाई और ट्यूशन के बीच समय निकालकर बहन के साथ गरीब बच्चों को पढ़ाना शुरू किया। शुरुआत महज दस बच्चों से हुई। बुद्धा कॉलोनी, मकदूमपुर और दीघा की बस्तियों में संसाधनों की कमी के साथ अभिभावकों को समझाना बड़ी चुनौती थी।
कई परिवार बच्चों को स्कूल भेजने के बजाय काम पर लगाना जरूरी समझते थे। स्नेहा ने घर-घर जाकर शिक्षा का महत्व समझाया। धीरे-धीरे विश्वास बढ़ा और बच्चे जुड़ने लगे।

लेट्स इंस्पायर बिहार संस्था के को-आर्डिनेटरों के सहयोग, स्वैच्छिक योगदान और आर्थिक सहायता से पाठशाला का विस्तार हुआ। आज यहां 150 बच्चे पढ़ रहे हैं। स्नेहा अब तक 20 बच्चों को दोबारा शिक्षा से जोड़ चुकी हैं।
तीन भाई-बहनों की बदली जिंदगी
दीघा के सात-आठ वर्षीय तीन भाई-बहन स्कूल नहीं जाते थे। उन्हें 'क-ख-ग' तक का ज्ञान नहीं था। स्नेहा ने उनके माता-पिता की कई बार काउंसलिंग की। आखिरकार तीनों का दाखिला दीघा के सरकारी स्कूल में कराया। अब वे नियमित विद्यालय जा रहे हैं।
लक्ष्मी को मिला शिक्षा का सहारा
महादलित समाज की लक्ष्मी मानसिक स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों के कारण सामान्य विद्यालय नहीं जा पाती थी। स्नेहा ने अभिभावकों को समझाकर उसे अपनी पाठशाला से जोड़ा। अब वह नियमित पढ़ रही है और उसके व्यवहार में भी सकारात्मक बदलाव आया है।

कमाई से भी बच्चों का भविष्य संवारने का सपना
स्नेहा बच्चों को पढ़ाने के साथ बस्तियों में महिलाओं को स्वास्थ्य और स्वच्छता के प्रति जागरूक भी करती हैं। उनका मानना है कि जागरूकता के बिना समाज का वास्तविक विकास संभव नहीं है। वह कहती हैं, मेरी कोशिश है कि ये बच्चे पढ़-लिखकर अच्छी नौकरी हासिल करें।
इनमें से किसी एक को भी आत्मनिर्भर होते देखना मेरे लिए बड़ी उपलब्धि होगी। आगे जब खुद कमाने लगूंगी, तो अपनी आमदनी से भी इनके लिए कुछ करना चाहती हूं। मां की सिलाई मशीन के सहारे पली-बढ़ीं स्नेहा अब शिक्षा के माध्यम से दूसरे परिवारों की तकदीर बदलने में जुटी हैं।
