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पटना के थानों की कहानी: 1915 में क्यों बनी थी कोतवाली, चौक-आलमगंज से कैसे शुरू हुआ शहर का पुलिस इतिहास?

Published: Sun, 20 Sep 2026 09:28 AM (IST)

पटना के पुलिस थानों का इतिहास शहर के विस्तार, व्यापार और स्वतंत्रता आंदोलनों से जुड़ा है, जो मुगलकालीन चौकियों से लेकर ब्रिटिश-युग के औपचारिक थानों तक फैला है।

कोतवाली थाने के भवन में द‍िखती है पश्‍चात्‍य वास्‍तुकला। जागरण

कोतवाली थाने के भवन में द‍िखती है पश्‍चात्‍य वास्‍तुकला। जागरण

HighLights

  1. पटना के थानों का इतिहास शहर के विकास से जुड़ा है।

  2. 1915 में कोतवाली थाना नए पटना की पहचान बना।

  3. दानापुर थाना 1857 विद्रोह और छावनी का साक्षी रहा।

शुभम कुमार, पटना।  आज जिन पुलिस थानों को शहर की कानून-व्यवस्था की पहली कड़ी माना जाता है, उनकी कहानी महज अपराध और पुलिसिंग तक सीमित नहीं है।

पटना जिले के थानों का इतिहास शहर के विस्तार, व्यापार, रेलवे, औपनिवेशिक प्रशासन, स्वतंत्रता आंदोलन और बदलते सामाजिक-आर्थिक ढांचे से जुड़ा है।

पुराने पटना यानी पटना सिटी में मुगलकालीन चौकियों और चुंगी केंद्रों से शुरू हुई सुरक्षा व्यवस्था अंग्रेजी शासन में औपचारिक थानों में बदली।

चौक, आलमगंज, खाजेकलां और मालसलामी जैसे थानों ने पुराने व्यापारिक शहर की सुरक्षा संभाली तो 1912 में बिहार-उड़ीसा प्रांत की राजधानी बनने के बाद पश्चिमी पटना के विस्तार के साथ 1915 में कोतवाली थाना अस्तित्व में आया।

दानापुर, मोकामा, बाढ़, मनेर, मसौढ़ी और पालीगंज जैसे इलाकों में भी व्यापार, रेलवे, सैन्य छावनियों और प्रशासनिक जरूरतों के साथ पुलिसिंग का विस्तार हुआ।

इन थानों ने 1857 के विद्रोह से लेकर 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन और बाद के छात्र आंदोलनों तक इतिहास के अनेक निर्णायक दौर देखे हैं।

1912 के बाद बदला पटना, 1915 में बनी नई कोतवाली

वर्ष 1912 में बिहार और उड़ीसा को बंगाल से अलग कर नया प्रांत बनाया गया और पटना को उसकी राजधानी घोषित किया गया। इसके बाद शहर का प्रशासनिक और भौगोलिक विस्तार पश्चिम की ओर तेजी से होने लगा।

नए सचिवालय, सरकारी कार्यालयों और आवासीय इलाकों के साथ एक नए पटना का निर्माण शुरू हुआ। इसी नए विकसित क्षेत्र की सुरक्षा के लिए 1915 में कोतवाली थाना अधिसूचित किया गया।

उस समय का एक दिलचस्प प्रशासनिक प्रसंग भी इससे जुड़ा बताया जाता है। तत्कालीन लेफ्टिनेंट गवर्नर ने शुरू में इस थाने की स्थापना के प्रस्ताव को ट्यूमर कह कर ठुकरा दिया गया था।

उनका आशय था कि नए और उस समय काफी हद तक वीरान क्षेत्र में इतने बड़े थाने की जरूरत शायद नहीं थी। हालांकि, बाद में सुरक्षा की जरूरत को देखते हुए दो मंजिला विशाल भवन को मंजूरी दी गई।

पहली मंजिल पर पुलिसकर्मियों के लिए स्टाफ क्वार्टर बनाए गए थे। कोतवाली की स्थापना के साथ नए इलाके में सुरक्षा का भरोसा बढ़ा।

इसके आसपास आवासीय भवन बनने लगे और प्रशासनिक क्षेत्र धीरे-धीरे शहर के महत्वपूर्ण हिस्से में बदल गया। कोतवाली के सामने सड़क के दूसरी ओर इलाहाबाद बैंक ने अपनी शाखा खोली।

इसकी भव्य ऐतिहासिक इमारत आज भी उस दौर की याद दिलाती है। इस तरह थाना केवल कानून-व्यवस्था का केंद्र नहीं रहा, बल्कि उसके आसपास विकसित हो रहे नए पटना के आर्थिक और सामाजिक विस्तार का भी एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया।

शुरुआती कोतवाली में कैसी थी पुलिस फोर्स

1915 के दौर में पुलिस व्यवस्था इंडियन पुलिस एक्ट, 1861 के ढांचे के तहत संचालित होती थी। उपलब्ध विवरणों और पुलिस रिकार्ड के अनुसार, कोतवाली जैसे महत्वपूर्ण केंद्रीय थाने में एक वरिष्ठ इंस्पेक्टर या सब-इंस्पेक्टर के नेतृत्व में पुलिस बल तैनात रहता था।

शुरुआती बल का अनुमान लगभग 2-3 सब-इंस्पेक्टर, 5-8 हेड कांस्टेबल और 40-50 फुट कांस्टेबल (पैदल सिपाही) का बताया गया है।

पहली मंजिल पर बने स्टाफ क्वार्टर का उद्देश्य भी तत्काल प्रतिक्रिया देने वाली पुलिस व्यवस्था को बनाए रखना था। संचार के आधुनिक साधन और तेज वाहन उपलब्ध नहीं होने के कारण पुलिसकर्मियों का थाने में या उसके आसपास रहना जरूरी माना जाता था।

उस दौर में पैदल गश्त सुरक्षा का प्रमुख साधन थी। बड़े हंगामे या दंगे की स्थिति में पुलिस बल को तत्काल घटनास्थल पर भेजना पड़ता था।

घोड़े, मस्कट और लाल पगड़ी वाली पुलिस

1915 से 1930 के दशक के बीच पुलिस के पास आधुनिक हथियारों और वाहनों की आज जैसी व्यवस्था नहीं थी। पुलिस के उपलब्ध विवरणों में .410 बोर की मस्कट गन के इस्तेमाल का उल्लेख मिलता है।

भीड़ नियंत्रण और सुरक्षा के लिए पुलिस बल को लाठियों से भी लैस रखा जाता था। कोतवाली क्षेत्र में घुड़सवार पुलिस की मौजूदगी का भी उल्लेख है।

डाकबंगला चौराहा और बेली रोड जैसे अपेक्षाकृत लंबे तथा सुनसान मार्गों पर गश्त के लिए घोड़ों का इस्तेमाल किया जाता था।

ब्रिटिश काल की पुलिस वर्दी में खाकी के साथ लाल पगड़ी का उल्लेख मिलता है। स्थानीय स्तर पर लाल पगड़ी वाली पुलिस की छवि पुलिस के प्रभाव और भय से जुड़ी हुई थी।

कोतवाली की इमारत में औपनिवेशिक वास्तुकला की झलक

एसएसपी कार्यालय के सामान्य शाखा रिकार्ड के अनुसार पुरानी कोतवाली भवन को औपनिवेशिक स्थापत्य शैली से जोड़कर देखा जाता है।

चूना, सुर्खी और ईंटों से निर्मित मोटी दीवारों तथा ऊंचे मेहराबदार दरवाजों वाली इस इमारत को गर्म मौसम और निगरानी की जरूरतों को ध्यान में रखकर बनाया गया था।

बड़ी खिड़कियों और हवादार संरचना के कारण भवन के भीतर प्राकृतिक हवा का बेहतर आवागमन होता था। भवन की स्थिति ऐसी रखी गई थी कि आसपास के महत्वपूर्ण इलाकों पर निगरानी रखी जा सके।

कोतवाली से भी पुराना है पटना सिटी का पुलिस इतिहास

1915 में कोतवाली बनने से पहले पटना का मुख्य आबादी वाला क्षेत्र आज के पटना सिटी में था। चौक, आलमगंज, खाजेकलां और मालसलामी जैसे इलाकों में व्यापारिक गतिविधियां, बाजार और आबादी का बड़ा हिस्सा केंद्रित था।

मुगलकालीन चौकियों और स्थानीय सुरक्षा व्यवस्था ने बाद में ब्रिटिश काल की औपचारिक पुलिस व्यवस्था का आधार तैयार किया।

चौक थाना: बाजार और व्यापार की सुरक्षा से निकली पुलिसिंग

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चौक थाना पटना सिटी के पुराने पुलिसिंग केंद्रों में गिना जाता है। इसके क्षेत्र में मारूफगंज और मंसूरगंज जैसी महत्वपूर्ण मंडियां थीं।

उपलब्ध विवरणों के अनुसार यहां सुरक्षा चौकियों की शुरुआत 19वीं सदी के शुरुआती-मध्य दौर में हुई और करीब 1902 के आसपास इसे आधुनिक पुलिस स्टेशन के रूप में सुदृढ़ किया गया।

व्यापारियों, अनाज और मसाला मंडियों तथा स्थानीय बाजारों की सुरक्षा इसका प्रमुख उद्देश्य था। मीर अशरफ मस्जिद और आसपास के पुराने ऐतिहासिक इलाकों की सुरक्षा में चौकीदारों और बरकंदाजों की भूमिका का भी उल्लेख मिलता है।

चौक थाना परिसर में पुराने शिव मंदिर का भी उल्लेख है। इसके निर्माण को 1902 के आसपास से जोड़ा जाता है और बाद में इसके जीर्णोद्धार के बाद 51 फीट ऊंचे शिवालय का स्वरूप विकसित होने की बात कही गई है।

कचौड़ी गली से जुड़ी स्थानीय ऐतिहासिक परंपराओं में पुराने दौर की कचहरी और उसके आसपास तैनात सुरक्षा बल का भी उल्लेख मिलता है।

आलमगंज: अफीम कारोबार और पुराने प्रवेश द्वार की सुरक्षा

आलमगंज थाना भी कोतवाली से कई दशक पुरानी पुलिस व्यवस्था का हिस्सा माना जाता है। गुलजारबाग क्षेत्र में अंग्रेजों की अफीम फैक्ट्री और सरकारी प्रतिष्ठानों के कारण इस इलाके का सामरिक और आर्थिक महत्व बढ़ गया था।

अफीम के भंडारण और परिवहन की सुरक्षा के लिए ब्रिटिश काल में यहां पुलिस और सुरक्षा बल की तैनाती की गई। गंगा के रास्ते माल को कोलकाता और आगे चीन तक भेजे जाने वाले अफीम व्यापार के संदर्भ में इस क्षेत्र का महत्व था।

मुगलकाल में आलमगंज शाही काफिलों के पड़ाव के रूप में भी जाना जाता था। यहां सुरक्षा व्यवस्था में शिकदार जैसे अधिकारियों की भूमिका थी।

बाद में अंग्रेजों ने पुरानी चौकी व्यवस्था को अपने प्रशासनिक ढांचे में शामिल किया और 1861 के पुलिस कानून के बाद इसे औपचारिक पुलिस व्यवस्था का हिस्सा बनाया। खानकाह मुनेमिया, गौघाट और तख्त श्री पटना साहिब जैसे धार्मिक स्थलों के आसपास की सुरक्षा व्यवस्था भी इस पुराने पुलिस क्षेत्र से जुड़ी रही।

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मालसलामी: चुंगी से पुलिस थाने तक

मालसलामी नाम को पुराने व्यापारिक कर और चुंगी व्यवस्था से जोड़कर देखा जाता है। पटना सिटी की पूर्वी सीमा पर बाहर से आने वाले माल पर कर वसूली की व्यवस्था थी।

बाद में इसी क्षेत्र में औपचारिक पुलिस व्यवस्था विकसित हुई। पुराने लाल रंग के भवन और मालखाने का उल्लेख मालसलामी थाना परिसर के ऐतिहासिक स्वरूप से जुड़ा है।

इसके अधिकार क्षेत्र में मारूफगंज और मंसूरगंज जैसी बड़ी मंडियां आती थीं। बंकाघाट से आने वाले माल की सुरक्षा भी इस क्षेत्र की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी थी।

खाजेकलां: पुराने शहर के बीच का पुलिस केंद्र

खाजेकलां थाना अशोक राजपथ के घनी आबादी वाले हिस्से में स्थित पुराने पुलिस केंद्रों में है। मुगल और नवाबी दौर में यह इलाका प्रशासनिक और कानूनी गतिविधियों से जुड़ा था।

ब्रिटिश काल में 19वीं सदी के उत्तरार्ध और 20वीं सदी के शुरुआती दौर में यहां औपचारिक पुलिस व्यवस्था विकसित हुई। घनी आबादी, संकरी गलियों और ऐतिहासिक भवनों के कारण इस क्षेत्र की पुलिसिंग हमेशा चुनौतीपूर्ण रही।

पटना सिटी का पुराना पुलिस ढांचा

ऐतिहासिक रूप से पटना की पुलिस व्यवस्था को सिटी सर्किल और टाउन सर्किल के रूप में देखा जाता था। सिटी सर्किल में चौक, आलमगंज, खाजेकलां और मालसलामी जैसे पुराने क्षेत्र शामिल थे, जबकि नए पटना के विस्तार के साथ कोतवाली, गर्दनीबाग, कदमकुआं और पीरबहोर जैसे थाने टाउन सर्किल से जुड़े।

आजादी के बाद आबादी बढ़ने के साथ पुराने थानों के क्षेत्र विभाजित हुए और नए थानों तथा पुलिस चौकियों का गठन हुआ। मेहंदीगंज, बाईपास और दीदारगंज इसी विस्तार की कड़ियां हैं।

दानापुर: छावनी, 1857 और सिविल पुलिस की कहानी

पटना जिले की पुलिसिंग का इतिहास केवल शहर तक सीमित नहीं है। दानापुर थाना भी जिले के पुराने और महत्वपूर्ण पुलिस केंद्रों में है।

1765-66 में दानापुर कैंट की स्थापना के बाद छावनी के बाहर रहने वाले नागरिकों, व्यापारियों और गंगा किनारे के बाजारों की सुरक्षा के लिए प्रारंभिक सुरक्षा चौकियों की जरूरत महसूस हुई।

ब्रिटिश शासन के दौरान दानापुर बाजार में ऐसी व्यवस्था विकसित हुई। अंग्रेजी प्रशासन ने नागरिक क्षेत्रों में मजबूत खुफिया और पुलिस व्यवस्था की आवश्यकता महसूस की। 1861 के पुलिस कानून के बाद 1870 के दशक में दानापुर को पूर्ण सिविल थाना बनाया गया था।

दानापुर से निकले कई नए थाने

शुरुआती दौर में दानापुर थाने का अधिकार क्षेत्र बेहद बड़ा था। इसमें दियारा, खगौल, शाहपुर और बेली रोड का बड़ा हिस्सा शामिल था। आबादी और शहरी विस्तार के साथ इसका क्षेत्र विभाजित होता गया।

खगौल को रेलवे गतिविधियों की सुरक्षा के लिए विकसित पुलिस केंद्र मिला। शाहपुर में दियारा और मनेर क्षेत्र की भौगोलिक चुनौतियों के कारण स्वतंत्र पुलिस व्यवस्था की जरूरत महसूस हुई।

रुपसपुर का गठन 2011-12 के आसपास तेजी से विकसित हो रहे बेली रोड, सगुना मोड़ और रुपसपुर इलाके की शहरी जरूरतों को ध्यान में रखकर किया गया।

एक शहर, कई थाने और कई सदियों की कहानी

  • चौक: पुराने बाजार और व्यापार का इतिहास सुनाता है।
  • आलमगंज: पुराने पटना और औपनिवेशिक आर्थिक गतिविधियों की कहानी कहता है।
  • मालसलामी: व्यापार और चुंगी की स्मृति से जुड़ा है।
  • खाजेकलां: घनी आबादी वाले पुराने शहर का चेहरा है।
  • कोतवाली: नई राजधानी और पश्चिमी पटना के विस्तार की पहचान है।
  • दानापुर सैन्य छावनी: 1857 की बगावत का साक्षी है।
  • खगौल: रेलवे के विस्तार की कहानी कहता है।
  • मसौढ़ी: रेल और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के बदलाव को दिखाता है।
  • मनेर: नदी और सूफी विरासत के बीच की पुलिसिंग को सामने लाता है।
  • मोकामा: रेल और उद्योग के विस्तार का प्रतीक है।
  • पालीगंज: कृषि और ग्रामीण सीमांत की कानून-व्यवस्था की कहानी कहता है।

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