'अतिक्रमण बताकर मनमाने ढंग से नहीं तोड़ सकते किसी का घर', बुलडोजर एक्शन पर पटना हाई कोर्ट का फैसला
पटना हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि बिना ठोस कारण और कानूनी प्रक्रिया के किसी नागरिक की संपत्ति को अतिक्रमण बताकर ध्वस्त नहीं किया जा सकता।

पटना हाई कोर्ट। (फाइल फोटो)
HighLights
बिना ठोस कारण संपत्ति ध्वस्त नहीं कर सकते अधिकारी।
कानूनी प्रक्रिया, आपत्तियों पर विचार करना अनिवार्य है।
हाईकोर्ट ने मार्च 2024 का आदेश रद्द किया।
जागरण जागरण, पटना। पटना हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि किसी नागरिक की संपत्ति या आवासीय मकान को अतिक्रमण बताकर बिना ठोस कारण और कानूनी प्रक्रिया का पालन किए ध्वस्त नहीं किया जा सकता।
अतिक्रमण से जुड़े मामलों में सक्षम प्राधिकारी को संबंधित पक्ष की आपत्तियों पर विचार करने के बाद स्पष्ट और तर्कपूर्ण आदेश पारित करना होगा।
न्यायाधीश आलोक कुमार की एकलपीठ ने पटना जिले के फुलवारीशरीफ और मालाही पकड़ी क्षेत्र से जुड़े दो अलग-अलग रिट मामलों में सुनवाई करते हुए यह महत्वपूर्ण फैसला सुनाया।
अदालत ने पाया कि अतिक्रमण के मामले में अंचल अधिकारी, फुलवारीशरीफ की ओर से पांच मार्च 2024 को पारित आदेश में याचिकाकर्ताओं की ओर से दाखिल आपत्तियों पर विचार किए जाने का कोई उल्लेख नहीं था।
जबकि हाईकोर्ट के पूर्व आदेश के अनुपालन में ये आपत्तियां दाखिल की गई थीं। पीठ ने कहा कि कोई भी न्यायिक, अर्ध-न्यायिक अथवा प्रशासनिक प्राधिकारी किसी व्यक्ति के अधिकारों को प्रभावित करने वाला आदेश बिना अपना विवेक लगाए और आपत्तियों पर विचार किए यांत्रिक तरीके से पारित नहीं कर सकता।
अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि आदेश में कारणों का उल्लेख न्याय का अनिवार्य हिस्सा है।
कारणयुक्त आदेश से यह स्पष्ट होता है कि प्राधिकारी ने उपलब्ध तथ्यों और संबंधित पक्ष की दलीलों पर निष्पक्षता से विचार किया है।
ऐसा नहीं होने पर मनमानी की आशंका बनी रहती है और उच्च न्यायालय के लिए आदेश की वैधता की समीक्षा करना भी कठिन हो जाता है।
जुल्फिकार हैदर बनाम उत्तर प्रदेश मामला
पीठ ने सुप्रीम कोर्ट के जुल्फिकार हैदर बनाम उत्तर प्रदेश राज्य मामले का उल्लेख करते हुए कहा कि आवास का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 का अभिन्न हिस्सा है और विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया का पालन किए बिना किसी का आवास नहीं छीना जा सकता। वहीं संपत्ति के अधिकार को अनुच्छेद 300ए का संवैधानिक संरक्षण प्राप्त है।
हाईकोर्ट ने पांच मार्च 2024 के विवादित आदेश को अस्पष्ट, अनुचित और मनमाना बताते हुए निरस्त कर दिया।
साथ ही मामले को संबंधित अधिकारियों के पास वापस भेजते हुए निर्देश दिया कि याचिकाकर्ताओं को सुनवाई का पर्याप्त अवसर देकर सभी आपत्तियों पर विचार करने के बाद नया और कारणयुक्त आदेश पारित किया जाए।
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