मुआवजा विवाद में BSRDCL की दलील खारिज, पटना हाईकोर्ट ने कहा- नए सिरे से होगा आकलन; 3 महीने की डेडलाइन
पटना हाई कोर्ट ने एनएच-82 चौड़ीकरण परियोजना के भूमि अधिग्रहण विवाद में एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने 2018 ...और पढ़ें

पटना हाईकोर्ट ने सुनाया अहम फैसला। सांकेतिक तस्वीर
HighLights
पटना हाई कोर्ट ने मध्यस्थता आदेश को आंशिक रूप से खारिज किया।
एनएच-82 भू-स्वामियों के मुआवजे के पुनर्मूल्यांकन का निर्देश दिया।
अधिग्रहण मुआवजा 1894 अधिनियम के तहत निर्धारित होगा।
विधि संवाददाता, पटना। भूमि अधिग्रहण विवादों पर एक महत्वपूर्ण फैसले में, पटना हाई कोर्ट ने एकल पीठ के आदेश को आंशिक रूप से खारिज कर दिया।
अदालत ने मध्यस्थता निर्णय को रद करने की राज्य सड़क निगम की कोशिश को खारिज करते हुए, राष्ट्रीय राजमार्ग 82 चौड़ीकरण परियोजना से प्रभावित भू-स्वामियों के मुआवजे के पूर्ण पुनर्मूल्यांकन का आदेश दिया है।
न्यायाधीश बिबेक चौधरी और न्यायाधीश राणा विक्रम सिंह की खंडपीठ ने गया जिले के भू-स्वामियों के खिलाफ बिहार स्टेट रोड डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन लिमिटेड द्वारा दायर अपील पर यह फैसला सुनाया।
क्या है मुख्य विवाद?
यह मामला 2014 की उस अधिसूचना से जुड़ा है, जिसके तहत एनएच -82 को चार लेन का बनाने के लिए वजीरगंज में 2.8676 एकड़ भूमि का अधिग्रहण किया गया था।
अपनी जमीन को कृषि योग्य मानकर किए गए शुरुआती मूल्यांकन से असंतुष्ट होकर भू-स्वामियों ने मध्यस्थता (आर्बिट्रेशन) की मांग की।
4 अगस्त 2018 को, अपर समाहर्ता-सह-मध्यस्थ, गया ने फैसला सुनाया कि प्लॉट नंबर 3243 का मूल्यांकन आसपास के ढांचों और मौजूदा पिलरों के कारण 'विकासशील भूमि' के रूप में किया जाना चाहिए।
हालांकि, बीएसआरडीसीएल ने दिसंबर 2018 में एक प्रशासनिक पत्र के जरिए इस आदेश को वापस भेजने का प्रयास किया।
निगम का तर्क था कि जून 2018 की केंद्र सरकार की अधिसूचना के तहत मध्यस्थता का अधिकार क्षेत्र प्रमंडलीय आयुक्त, गया को स्थानांतरित कर दिया गया था।
पिछली तारीख से नहीं छीन सकती अधिकार क्षेत्र
हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि प्रशासनिक अधिसूचनाएं भविष्यलक्षी रूप से लागू होती हैं और ये लंबित मध्यस्थता कार्यवाहियों से पिछली तारीख से अधिकार क्षेत्र नहीं छीन सकतीं।
इसके परिणामस्वरूप, अदालत ने BSRDCL के पत्र को रद किए जाने के फैसले को बरकरार रखा। हालांकि, अदालत ने 2018 के मध्यस्थता आदेश को मौलिक रूप से त्रुटिपूर्ण पाया।
क्योंकि मध्यस्थ राष्ट्रीय राजमार्ग अधिनियम, 1956 की धारा 3जी (7) के तहत अनिवार्य घटकों—जैसे अधिसूचना की तिथि पर बाजार मूल्य या भूमि पृथक्करण क्षतिपूर्त की गणना करने में विफल रहे थे।
इसके अलावा, चूंकि अधिग्रहण की अधिसूचना 1 जनवरी 2015 से पहले की थी, इसलिए मुआवजे का निर्धारण भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 1894 के तहत ही किया जाना चाहिए।
अदालत का निर्णय खंडपीठ ने सक्षम प्राधिकारी को निर्देश दिया कि वे अधिग्रहीत प्लॉट के मुआवजे का पुनर्मूल्यांकन 1894 के अधिनियम के तहत वैधानिक सोलेटियम (तुष्टि-राशि), ब्याज और सोलेटियम पर ब्याज के साथ तीन महीने के भीतर पूरा करें।
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